रविवार, 17 जनवरी 2016

ग़ज़ल।मौत तक आती नही।

    ग़ज़ल।मौत मिल पाती नही।

आजकल तन्हा है साहिल नींद तक आती नही ।
अब बेबसी बेहाल रौनक रूह तड़पाती नही ।

तोड़कर दिल जख्म पर मरहम लगाना याद है ।
भूलता कैसे भला मैं बुझदिली आती नही ।।

एक पल क्या मुस्कराया उम्रभर रोना पड़ेगा ।
प्यार की बेमानियो पर हमदिली आती नही ।

बेवफ़ाई की सज़ा का हक मुझे मिल ही गया पर ।
दर्द इतना बढ़ गया कि याद तक आती नही ।

कौन सा बदला मुक़र्रर प्यार में तेरे करू मैं ।
मौत के बदले यहाँ पर मौत मिल पाती नही । 

जा' चला जा दोस्त "रकमिश"बद्दुआ तुमको लगे न । 
अब दुआयें दोस्तों की दिल तलक आती नही ।

           gajalsahil.blogspot.com
                   रकमिश सुल्तानपुरी  

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