मंगलवार, 12 जनवरी 2016

ग़ज़ल । इशारे दर्द के उभरे।

      ।।ग़ज़ल।इशारे दर्द के उभरे।।

कभी जब चाँद देखा तो सितारे दर्द के उभरे ।
तुम्हारे रूप से पहले नजारे दर्द के उभरे ।।

नज़र की क्या खता माने अग़र आँखों में पानी हो ।
पलक झपके कि न झपक़े किनारे दर्द के उभरे ।।

किसी से क्या कहूँ दिल की कोई सुनकर करेगा क्या ।
सितम दिल पर ही होना है सहारे दर्द के उभरे ।। 

ये तन्हा शख़्स भी तो था कोई मासूम सा चेहरा ।
वो लज्जत ,गम भरे लम्हे तुम्हारे दर्द के उभरे ।।

न साहिल है, न मंजिल है, न मंजिल की कोई चाहत ।
न क़ाबिल रह गया दिल का बेचारे दर्द के उभरे ।।

यहा "रकमिश" निगाहों से ज़िगर तक चीर देते है ।
मिले अब तक हमे जो भी इशारे दर्द के उभरे ।। 

                    ©रकमिश सुल्तानपुरी

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