।।ग़ज़ल।इशारे दर्द के उभरे।।
कभी जब चाँद देखा तो सितारे दर्द के उभरे ।
तुम्हारे रूप से पहले नजारे दर्द के उभरे ।।
नज़र की क्या खता माने अग़र आँखों में पानी हो ।
पलक झपके कि न झपक़े किनारे दर्द के उभरे ।।
किसी से क्या कहूँ दिल की कोई सुनकर करेगा क्या ।
सितम दिल पर ही होना है सहारे दर्द के उभरे ।।
ये तन्हा शख़्स भी तो था कोई मासूम सा चेहरा ।
वो लज्जत ,गम भरे लम्हे तुम्हारे दर्द के उभरे ।।
न साहिल है, न मंजिल है, न मंजिल की कोई चाहत ।
न क़ाबिल रह गया दिल का बेचारे दर्द के उभरे ।।
यहा "रकमिश" निगाहों से ज़िगर तक चीर देते है ।
मिले अब तक हमे जो भी इशारे दर्द के उभरे ।।
©रकमिश सुल्तानपुरी
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