शनिवार, 7 नवंबर 2015

ग़ज़ल।हर शख़्स गुनेहगार है ।

  ग़ज़ल । हर शख़्स गुनेहगार है।

इश्क़ और प्यार से अब उठ गया एतबार है ।
जिसने भी डाला नज़र हर वो शख़्स गुनेहगार है ।।

है सौदागरों की महफ़िल कभी भूलकर न आना ।
हो संगदिल या हमदिल सब एक से गद्दार हैं ।।

कर रहा होगा कहीँ पर साजिशे तेरे प्यार में ।
जो तेरे लिये तन्हाइयों में आज बेक़रार है ।।

वक्त की पैमाइसे है ,वक्त की नुमाइसे सब ।
जब वक्त तेरा न रहा तब दिल तेरा बेकार है ।।

लुट रहा या लूटता है खुद पता जिसको नही ।
रास्ता जो भी रहा हो पर ग़म यहां तैयार है ।

बन मुसाफ़िर फ़िर रहे है रहबरों की चाह में ।
मुफ़लिसी वे क्या करेगे जो खड़े मजधार है ।।

साहिलों पर टिक न पाते ग़म भरे जज़बात वो ।
'रकमिश' इरादे इश्क़ में ख़ुदा ही मददग़ार है ।।

                      .....R.K.MISHRA

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