बुधवार, 2 दिसंबर 2015

ग़ज़ल।यही दस्तूर होता है ।

     ग़ज़ल। यही दस्तूर होता है ।

जिसे चाहो मुहब्बत में वही मजबूर होता है ।
रहे तन्हा,उदासी ,गम बड़ा मशगूल होता है ।।

मिलेगीं एक पल खुशियां नजर भर अश्क़ आयेंगे ।
उम्रभर फासले मिटते मग़र वह दूर होता है ।।

बनेंगे रोज़ यादों के झरोंखे चाँद में चेहरा  ।
यही सच है मुहब्बत का यही दस्तूर होता है ।।

ख़ुशी के एक लम्हे जो हमे जीना सिखाएंगे ।
बनेगे जिंदगी के गम ज़रा भरपूर होता है ।।

ख्वाबो की जमी पर ही आहे ऱोज उभरेंगी ।
मिले जो ख़ुशनुमा साहिल असल में दूर होता है ।।

मंजिलें पास ही होंगी मिलेंगे रास्ते खुद से ।
जिंदगी कट भी जाये पर नही मंजूर होता है ।।

मिलेंगी दर्द की मजलिश बेशक गम के मंजर भी ।
यकीनन जख्म हो ताज़ा गमे नासूर होता है ।।

करो तुम कूँच साहिल से "रकमिश"बेवफा दुनिया ।
यहा नादान दिल वाले नशेमन चूर होता है ।।

                            @राम केश मिश्र

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