मंगलवार, 8 दिसंबर 2015

ग़ज़ल।यहा इज्ज़त नही मिलती।

   ग़ज़ल।यहा इज्जत नही मिलती।

मुहब्बत में गुनाहों से जिन्हें मोहलत नही मिलती ।
खुदाई है खुदा की पर कभी रहमत नही मिलती ।

छिपी मासूम चेहरों पर गुनाहों की कहानी है ।
अदाओं की नुमाइस से इन्हें फ़ुरसत नही मिलती ।

यक़ीनन ढह ही जायेगी हमारे ख़वाब की मंजिल ।
मुझे मालूम है फिर भी तनिक राहत नही मिलती ।

सहेगे और भी सदमे तुम्हारी चाह में बेबस ।
चला मैं दूर जाऊँगा यहा नफ़रत नही मिलती ।

पलटकर देखने की तुम करोगे लाख़ कोशिस पर ।
हुई बेज़ार नजरो से कभी जन्नत नही मिलती ।

बहुत नाज़ुक तज़ुर्बे है तुम्हारे प्यार के 'रकमिश' ।
शहर से जा रहा तेरे यहा इज्ज़त नही मिलती ।

                       @राम केश मिश्र

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