।।शेर।। किस्से दर्द के अक्सर।
करूँ किससे शिकायत मैं तुम्हारे प्यार की संगदिल ।
साहिल से समन्दर तक तुम्हारी ही तो चर्चा है ।।
डूबकर देखा हूँ एहसासों की तपिस के शाये में ।
खुद की चाहतो की कही भी मंजिल नही पाया ।
यहा के लोग है कातिल सजा ऐ मौत से पहले ।।
हजारो बार मरते है मुहब्बत में मुअक्किल अब ।।
मुहब्बत से जो बच निकले उन्हें नफरत ने मारा है ।
भरी महफ़िल में अब भी वो तन्हा है अकेले है ।।
वहा भी सब्र न मिलता यादों की रवानी से ।।
किस्से दर्द के अक्सर दिनोदिन याद रहते है ।।
@राम केश मिश्र
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें