शुक्रवार, 30 अक्टूबर 2015

ग़ज़ल.दौलत पर नही मरती ।

      ग़ज़ल.दौलत पर नही मरती ।

ये दुनियां संगदिल निकली मुहब्बत क्यों नही करती ।
फ़रेबी है अपनेपन की दौलत पर नही मरती ।।

चलो तुमको दिखाते है दवाओ की दुकानों में ।
तड़पते लोग रहते है दवा उनको नही मिलती ।।

बने मज़दूर बच्चों पर तरस अब हम नही खाते ।
करे दिन रात मेहनत पर आह उनकी नही थमती ।। 

जहा देखो वही पर अब रिश्वत की वसूली है ।
न जाने शख्शियत क्या है जेब उनकी नही भरती ।

न जाने कौन सी मिट्टी से बने है लोग दुनिया के ।
भलाई की परत बेशक़ अब उनपे नही चढ़ती ।।

यहाँ पर प्यार के भी तो अज़ब किस्से कहानी हैं ।
हवस बढ़ती ही जाती है कली दिल की नही खिलती ।।

उजाला नाम दे देकर अँधेरा खूब बढ़ाते है ।
दीवाली रोज आती पर दिलों के तम नही  हरती ।।

यहाँ के लोग रोते है खुदी के दर्द से ग़ाफ़िल ।।
ख़ुशी की देखकर रकमिश" ख़ुशी उनको नही मिलती ।। 

                      ---- R.K.MISHRA

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