गुरुवार, 8 अक्टूबर 2015

।।ग़ज़ल।।गर्म शोले उगलती है।।

  ।।ग़ज़ल।।गर्म शोले उगलती है।।
                             R.K.MISHRA

बरसकर सूख जाते है पसीनों की न चलती है  .
तपिश इस धूप की देखो सेवारो में मचलती है .

हमारे खेत में आकर जली फ़सलो को देखो तुम ,
यहाँ की मिट्टियाँ है तप्त गर्म शोले उगलती है  .

न टहनी हैं ,न पल्लव हैं ,न आशा फूल की इनमे ,
पत्तिया सूखकर लावा बनती है लटकती है .

खड़ा मेड़ो पर रहता हूँ खुरपी हाथ में लेकर ,
न घासें है न घासों में कोई रौनक़ उभरती है .

लगाकर पम्प से पानी भरता रोज इनको हूँ  ,
करूँ मैं लाख़ कोसिस पर धरा दिन रत जलती है .

निगाहें उठ ही जाती हैं जहाँ धुएं उमड़ते है ,
चिमनिओ के,नही बदल की छाया भर उमड़ती है .

अगर हो आँख में पानी तो भर दूँ आज इनको मैं ,
मग़र सूखी इन नदियो में निराशा ही झलकती है .

करू जी जान से मेहनत यही मिलता किसानी में,
करूँ किससे शिकायत मैं गर्म आहे निकलती है  .

                        ×××

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