शुक्रवार, 2 अक्टूबर 2015

।।ग़ज़ल।।एतराज क्यूँ करते हो।।

।।ग़ज़ल।।एतराज़ क्यूँ करते हो।।

दिखाकर रूप का जलवा गमे अंदाज क्यूँ करते हो ।।
सजाकर इश्क़ की महफ़िल मुझे बेताज क्यूँ करते हो ।।

निखलिश इश्क़ के जलवे उम्रभर है नही चलते ।।
जरा रौनक तो आने दो अभी से नाज़ क्यूँ करते हो ।।

यहा पर प्यार में हुस्न की चाहत नही होती किसे ।।
फिर वफ़ा के नाम पर एतराज क्यूँ करते हो ।।

तेरे आगोश के सपने मुझे हरपल सताते है ।।
मिटे जब फासले है ही तो आवाज़ क्यूँ करते हो ।।

अदायें आज तेरी जो मुझे मुफ़लिस बनाती थी ।।
उन्ही को शर्म का परदा बना अल्फ़ाज़ क्यूँ करते हो ।।

वहा देखो जहा पर तन्हा चाँद निकला है ।।
अग़र है साथ 'साहिल' पर तो अकाज क्यूँ करते हो ।।

                    ...R.K.MISHRA

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