रविवार, 4 अक्टूबर 2015

।।ग़ज़ल।।मेरी जुर्रत नही होती।।

   ।।ग़ज़ल।।मेरी जुर्रत नही होती।।

हमारे आँख के आंशुओं की कीमत नही होती ।।
अब ग़म और तन्हा से दिक्कत नही होती ।।

प्यार के सारे हुँनर मैं सीख़कर रोया किया ।।
इस इश्क़ में चाहतो की इज्जत नही होती ।।

प्यार को इक शौक़ सा सब पाल लेने है लगे ।।
अब अज़नबी दर अज़नबी हुज्जत नही होती ।।

प्यार में जब दूरियाँ बढ़ गयी तो खो गये ।।
अब इंतजरो के लिये फुर्सत नही होती ।।

सब्र करता कब तलक मैं साहिलों पर खो गया ।।
दर्द सुनते लोग सब पर मोहलत नही होती ।।

इश्क़ के इस दरमियां मैं हकीमो से मिला ।।
कह दिये तहक़ीक़ कर कि मन्नत नही होती ।।

या इलाही दर्द तेरा बन गया नासूर अब ।।
अब मेरे इन मरहमो से राहत नही होती ।।

हो सके आ देख लेना साहिलों पर दर्द मेरा ।।
अब इश्क़ करने की मेरी जुर्रत नही होती ।।  

                       R.K.MISHRA

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