शनिवार, 3 दिसंबर 2016

ग़ज़ल।मुहब्बत वो नही होती ।

       ग़ज़ल। मुहब्बत वो नही होती ।।

वफ़ा में इश्क़ में बंदिश इनायत वो नही होती ।
मिले जो मांगकर चाहत मुहब्बत वो नही होती ।।

किसे परवाह है दिल में झरोखा हो रहा कितना ।
कहे जो आँख के आँसू हक़ीक़त वो नही होती ।।

मिले जो रहनुमां बेशक़ इरादे नेक हो उसके ।
वही मज़बूर कर दे तो हिफ़ाजत वो नही होती है ।।

जरूरी है क़ि ज़ाहिर हो तुम्हारी ह्मवफ़ाई भी ।
दिलों में जख़्म कर जाये शरारत वो नही होती ।। 

वफ़ा में बदसलूकी से नतीज़े लाख़ हो बेहतर ।
गुनाहों में जो साज़िस हो मुरौव्वत वो नही होती ।। 

कफ़न का ख़ौफ़ है जिनको जिहादी वो नही होते । 
मिली जो मौत लालच में शहादत वो नही होती ।। 

लगाकर देख ले रकमिश" तेरा दिल टूट जाएगा ।
मिला चाहत के बदले जो नसीहत वो नही होती ।।

                                राम केश मिश्र

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