मंगलवार, 4 अक्टूबर 2016

ग़ज़ल।साहिलों पर दुश्मनो को आजमाने पड़ गये।

वक़्त की बंदिश रही वादे निभाने पड़ गये ।
दोस्ती भी न मिली रिस्ते भुलाने पड़ गये ।।

थी जरा मुश्क़िल मग़र मैं फूँक कर चलता रहा । 
बेवज़ह ही हमदिलों के दिल दुखाने पड़ गये ।।

जिंदगी खुद में पहेली सी मुझे लगने लगी थी ।
आँसुओ से ज़ख्म सारे फ़िर नहाने पड़ गये ।।

एक अर्से से सिसकता जी रहा था आज तक ।
दर्द के वो गीत फिर से गुनगुनाने पड़ गये ।।

माँग सकता था नही मै खुद खुदा से मिन्नते पर ।
आपके जज़्बात में खुद को झुकाने पड़  गये ।।

तुम मिले तो क्या मिले जो ख़ुसी थी मिट गयी ।
दर्द बन सैलाब उमड़ा आँसू बहाने पड़ गये ।।

सुन जरा रकमिश तुम्हारी दोस्ती में क्या मिला ।
साहिलों पर दुश्मनों को आजमाने पड़ गये ।।  

                        ©©राम केश मिश्र 'रकमिश'

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