सजी महफ़िल दिवानों से मग़र गर्दिश नजर आया । ।
कोई मुल्ज़िम नज़र आया कोई मुफ़लिस नजर आया ।।
तकल्लुफ़ इश्क़ के दरम्यां हरारत की हवा बरपी ।
ख़ुदी की चाह पर बेशक़ वहा बंदिश नजर आया ।।
हवाला दे रहे थे सब मेरी ही बदसलूकी का ।।
मेरा वो शक़ जताना ही उन्हें साज़िस नजर आया ।।
खिले सब चाँद से चेहरे कि जुल्फें चमचमाती थी ।
दिलों में कमसिनी थी पर उन्हें नरगिश नजर आया ।।
निगाहें चुन रही तन्हा किसी चेहरे की रौनक़ को ।
यक़ीनन शौक़ ऐ जलवा जवां आतिश नजर आया ।।
साबित था जुनूने-गम मग़र ग़ुमराह था रकमिश ।
मनाही इश्क़ की करता वही मुंसिफ़ नज़र आया ।।
©© राम केश मिश्र
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