मंगलवार, 19 सितंबर 2017

नमक जो देश का खाकर विदेशी पेश आता है ।

*****************ग़ज़ल****************

  शराफ़त छोड़ कर सच की हँसी भरसक उड़ाता है ।
  नकारा आदमी काबिज़  सभी का  दिल  दुखता है ।

  शहर  मेरा  सुधर  जाए  ख़ुदा  ऐसी  इनायत  कर ।
  यहाँ पर आदमी  दौलत पे  रिश्तों  को  लुटाता  है ।

  मुहब्बत से इलाजों का असर  जिन पर नही होता ।
  नफ़ासत बो  रहा  मन मे  वही  रंजिश  बढ़ाता  है ।

  हमेशा   चापलूसी  कर   डरा  है   आदमीयत  से ।
  इमानत  छोड़  लालच मे अपना  सिर  झुकता  है ।

  बसा दे न शहर  यिक दिन कहीं  वो बेईमानी  का ।
  नमक जो देश का  खाकर  विदेशी  पेश  आता है ।

  ख़ुदा मेरे तुम्ही रहबर  दिखा  दो आइना  सच का ।
  मरी   इंसानियत   जिसकी  वही  ईमान  गाता  है ।

  यही है  आरजू  'रकमिश' उतर धरती  पे तु  आये ।
  गुमानी  बन  वहशियत  की नदी  इंसां  बहाता  है । 

                              ✍✍ रकमिश

रविवार, 17 सितंबर 2017

तुम्हें मालूम हो न हो ये तेरा दिल दिवाना है ।

::::::::::::::::::::::::::ग़ज़ल :::::::::::::::::::::::::

    तेरा ये  गमसुदा  होना  हक़ीक़त  मे  बहाना  है ।
    तुम्हे  मालूम  हो न  हो ये तेरा  दिल  दिवाना है ।

    तिरी परछाइयां तक अब अदायें पेश कर देती  ।
    रुकी खामोशियों मे भी ग़ज़ब मौसम सुहाना है ।

    ख़ुदी दिन रात पढ़ता है तेरे चेहरे की  मदहोशी ।
    किसी दिन रात को आकर अदा तेरी चुराना है । 

    रवायत है, अदावत है, वफ़ासत  है  मुहब्बत ये ।
    अमानत है मिटा तन्हा ख़ुदी का दिल लुटाना है ।

    पिलाती झील सी आंखे  नसे मे  घूँट भर  आहे ।
    नज़र की झील मे ख़ोकर तिरी तस्वीर  पाना है ।

    चलो चलते है  साहिल पर  करेंगे  प्यार के चर्चे ।
    किसी की जान ले लेगा  जो तेरा  मुस्कुराना है ।

    नज़र के ही इशारों से ज़रा दे हौसला 'रकमिश ।
    निभा रस्में मुहब्बत की  तुम्हे अपना  बनाना है । 

                                 रकमिश सुल्तानपुरी



शनिवार, 16 सितंबर 2017

जिन्दगी ख़ुद की पराई हो गयी ।

        दिल्लगी  मे  जब  जुदाई  हो  गयी ।
        जिंदगी   ख़ुद  की  पराई  हो  गयी ।

        मिल गयी मंजिल मुहब्बत की मुझे ।
        बेसबब   ग़म  से  मिताई  हो  गयी ।

        दर्द   के   मंजर   मिले    प्यार   मे ।
        दिल्लगी    मे   बेवफ़ाई   हो  गयी ।

        चाहतों  पर  रंजिशें  थी  और  भी ।
        बेबसी    की   रहनुमाई   हो  गयी ।

        ढह गया बेशक़ घरौंदा  प्यार  का ।
        हसरतों  की भी  विदाई  हो  गयी ।

        देखकर   ग़म  मुस्कुराती  दूर  से ।
        मौत   भी   आततायी   हो   गयी ।

        बेदख़ल 'रकमिश' हुआ  प्यार मे ।
        इश्क़  मे  दुनिया  पराई  हो गयी ।

                               रकमिश सुल्तानपुरी

बुधवार, 13 सितंबर 2017

आदमी आज फ़िर मुस्कुराने लगा ।

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      फ़र्ज़ अपना  जहां मे निभाने  लगा ।
      आदमी आज फ़िर  मुस्कुराने लगा ।

      तोड़कर जाति धर्मों के बंधन सभी ।
      प्यार की लौ हृदय मे जलाने  लगा ।

      खा रहे एक थाली  मे  निर्धन  धनी ।
      कोई  रूठा  तो  कोई  मनाने  लगा ।

      पुत्र परिवार का  एक  सहारा  बना ।
      मां पिता के बचन वो  निभाने लगा ।

      हार   मे  जीत  मे  फ़ासले  न   रहे ।
      हौसला वो सभी  का  बढ़ाने  लगा ।

      आग़ बदले की भड़की थी संसार मे ।
      एकजुटता से  उसको  बुझाने  लगा ।

      मिल रही है ख़ुसी देख रकमिश तुझे ।
      अंधा  लूले  को  राहें  दिखाने  लगा ।

                           रकमिश सुल्तानपुरी

ज़माने को वही ख़लता रहा ।

----------------ग़ज़ल-----------------

      वफ़ा  की  राह जो  चलता  रहा है ।
      जमाने  को  वही  ख़लता  रहा  है ।

      फ़रिश्ते  को  लगी है  ठोकरें  खुब ।
      ग़मो मे  भी   मग़र   बढ़ता रहा  है ।

      मिली तनहाइयां सच को यहाँ  पर ।
      अमादा  झूठ   वो  पलता  रहा  है ।

      मुहब्बत  मे  फिरौती हो  रही  अब ।
      जुबां से  चुप कोई  लुटता  रहा  है ।

      कमीनों   के   लिए  बरपी  वफ़ाई ।
      दिवाना   रात  भर  मरता  रहा  है ।

      गुनाहों  के   लिए   बेशक़   रिहाई ।
      इमानत को क़ज़ा मिलता  रहा  है ।

      जमाना दोगला "रकमिश  सताता ।
      शहादत   मांगता  छलता  रहा  है ।

                      रकमिश सुल्तानपुरी

                     

आइना उसको दिखाना चाहिए ।

""'''''''''''''''''''""""""""""""""ग़ज़ल""""""""''''"'''""""""""""""

      आग़  बदले  की  बुझाना  चाहिए ।
      हर किसी को  मुस्कुराना  चाहिए ।

      नफ़रतों से ज़ख़्म ही मिलता सदा ।
      रंजिशों  को  भूल   जाना  चाहिये ।

      जिंदगी बस चार दिन की चाँदनी  ।
      प्यार  से इसको  सजाना  चाहिए ।

      मंज़िलों को छोड़कर दहलीज़ पर ।
      फ़र्ज़  दुनियां  मे  चुकाना  चाहिए ।

      फ़र्क जिसको है नही सच झूठ का ।
      आइना   उसको  दिखाना  चाहिए ।

      छोड़कर अब  इश्क़ मे  हैवानियत ।
      दिल्लगी  दिल से  निभाना चाहिए ।

      हो रही "रकमिश  बड़ी  तौहीनियां ।
      अश्मिता  सबको  बचाना  चाहिए ।

                        रकमिश सुल्तानपुरी

सोमवार, 11 सितंबर 2017

दग़ा देने मुहब्बत के बहाने लोग निकले है ।

================ग़ज़ल=================

   दुनियां  के  रिवाजों को  भुलाने  लोग   बैठे   है ।
   नये ज़ख़्मो को देखो फ़िर दुखाने  लोग  बैठे  है ।

   ढहा रिश्तों कि दीवारें  वफ़ा की  खा रहें क़समें ।
   जुबां   मे  ख़ंजरों  को  ले  पुराने   लोग  बैठे  है ।

   बिकाऊँ हूं नही फिर भी बिका महसूस करता हूं ।
   ख़ुदा की भी यहाँ  क़ीमत  लगाने  लोग  बैठे  है ।

   भरोसा उठ गया  जबसे  यहां  हैवानियत  बरपी ।
   भरे   आँखों   मे  आंसू   को  छिपाने  लोग  बैठे ।

   नतीज़े आ रहे  बेशक़  रुआँसा  आदमी  मिलता ।
   सज़ा अपनी नफ़ासत का  चुकाने  लोग  बैठे  है ।

   रहेगा  ग़र   यही  मंज़र   बचेगा  आदिमा   हरसूं ।
   अभी   से  ग़मभरे  किस्से  सुनाने  लोग  बैठे  हैं ।

   कहां तक मै लिखू रकमिश कमीनी दास्ताँ इनकी ।
   दग़ा    देने   मुहब्बत   के  बहाने   लोग   बैठे   है । 

                           रकमिश सुल्तानपुरी

शुक्रवार, 8 सितंबर 2017

मुझे हर दर्द मालुम है दवा पाने नही निकला ।

  ================ग़ज़ल================

    तनिक आया हूँ गर्दिश में हवा खाने नही निकला ।
    ग़मो का लुफ़्त लेता हूँ वफ़ा  पाने  नही  निकला ।

    बड़े दिन बाद पाया हूँ दिवानों की  कोई महफ़िल ।
    दिवानापन उमड़ आया ज़फ़ा पाने नही  निकला ।

    झलक भर देख लेने से  दिवाना मत समझ  लेना ।
    गुमानी  कमसिनों की मै अदा पाने  नही निकला ।

    पुराने  हो गये  मसले  मग़र  हर  जख़्म  ताज़ा है ।
    मुझे  हर दर्द  मालुम है  दवा  पाने  नही  निकला ।

    नजऱ का तेज़ खंज़र वो छुपा है आज भी दिल में ।
    तड़पता ऱोज दिल है पर मज़ा पाने  नही निकला ।

    मुज़रिम  हूँ,  दिवाना  हूँ , बेगाना हूँ , आवारा  हूँ ।
    मारा  हूँ  मुक़द्दर  का  सजा  पाने  नही  निकला ।

    पता साहिल  का लेने ख़ुद गमों के  कारवां  आते ।
    मुहब्बत का  मसीहा हूं  ख़ुदा पाने  नही  निकला ।

    चला आया हूँ 'रकमिश'मैं लुटाने प्यार की दौलत ।
    मुझे है दर्द की ख़्वाहिश नफ़ा पाने  नही निकला ।

                .             @राम केश मिश्र

तू सुलगती आग तो शोला बना तैयार मैं हूं ।

================ग़ज़ल=================

    सोच मत लग जा गले से बेक़सक दिलदार  मैं  हूं ।
    तू  सुलगती  आग़   तो  शोला  बना  तैयार  मैं  हूं । 

    हो गयी काफ़ी  नशीहत  दर्द  गम  तनहाइयाँ  वो ।
    सुर्ख  होठो  पर   सजाने  के  लिए  सृंगार  मैं  हूं ।

    साहिलों की गर्दिशों मे  रह अकेला  उम्रभर अब ।
    दर्द,  गम,  तन्हाइयों  मे हो  गया  खूंखार  मै  हूं ।

    रौशनी  बनकर अंधेरी  रात मे आ  जा  सितमगर ।
    आ बुझा दे  आग  सारी  जल  रहा  अंगार  मैं  हूं ।

    तू तड़पकर  बेबसी  मे  जी  रही  होगी  यक़ीनन ।
    साहिलों पर छोड़  तन्हा  आ  समंदर  पार  मैं  हूं ।

    उम्रभर   यूँ   दूरियों   से  तप  गयी   मदहोशियाँ ।
    उस रूहानी आह  से पैदा  हुआ  किरदार  मैं  हूं ।

    आ मिलन की कश्मकश मे सामना पुरजोर होगा ।
    इश्क़ की गर धार तू तो  जिश्म की तलवार  मैं हूं ।

    तू तरस जाएगा "रकमिश' पा शबाबे -इश्क़  को ।
    हलचलें उठती रही उस झील का  मंझधार  मै हूं । 

                        Ram Kesh Mishra

मंगलवार, 5 सितंबर 2017

जहां मे ज्ञान का पौधा सदा बोता रहा शिक्षक ।

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    सजता राह जीवन की स्वंय खोता रहा शिक्षक ।
    जहां मे ज्ञान का पौधा सदा बोता रहा  शिक्षक ।

    हमारी एक ग़लती  पर  हमे  वो  डांटने  लगता ।
    दिखाकर राह सच झूठी सज़ा देता रहा शिक्षक ।

    मिले जो कामयाबी  तो वो पीठें  थपथपाता  है ।
    हमारी हार सुनकर के  दुखी होता रहा  शिक्षक ।

    बने हम नागरिक सच्चे  करें हम  देश की सेवा ।
    हमेशा  देश  भक्ति मे  हमे  धोता रहा  शिक्षक ।

    सिखाता पाठ जीवन के मिटाता अन्ध हृदय से ।
    महापुरुषों के साये को ख़ुदी ढ़ोता रहा शिक्षक ।

    पिता, माता ,सखा, भाई तनय सा प्यार देता  है ।
    सभी रिस्तो के सागर मे लगा गोता रहा शिक्षक ।

    करेंगे नाम दुनियां मे यही उम्मीद रख "रकमिश ।
    चिरंगुन हम बना  पंछी  हमे  सेता  रहा  शिक्षक । 

                         राम केश मिश्र
                     सुलतानपुर उत्तर प्रदेश

नशा ए इश्क

ग़ज़ल   नशा ए इश्क अब छोड़ा न जाए ।  जमाने से मगर उलझा न जाए ।   बड़ी मासूम हैं उसकी अदाएं,   कि मुझसे और अब देखा न जाए ।   गरीबों ...