क्रोध की आग मे सो रहा आदमी ।
जिंदगी मे ज़हर बो रहा आदमी ।।
प्यार की कोई क़ीमत लगाता नही ।
दुश्मनी को लिए ढो रहा आदमी ।।
बदगुमां, बेवफा, बेरहम, बेशरम ।
जोश मे खुद ख़ुदा हो रहा आदमी ।।
दर्द देकर वफ़ा ढूढ़ता भीड़ मे ।
है अकेला मग़र खो रहा आदमी ।।
इश्क़ मे दर्द की जब दवा न मिली ।
आंसुओं से ज़ख़म धो रहा आदमी ।।
फैसला हो रहा है सबूतों के दम ।
दोगली चाल चल तो रहा आदमी ।।
दाँव पर लग गयी शाख रकमिश तिरी ।
बाखुदा बन गया जो रहा आदमी ।।
✍रकमिश सुल्तानपुरी