बुधवार, 13 सितंबर 2017

ज़माने को वही ख़लता रहा ।

----------------ग़ज़ल-----------------

      वफ़ा  की  राह जो  चलता  रहा है ।
      जमाने  को  वही  ख़लता  रहा  है ।

      फ़रिश्ते  को  लगी है  ठोकरें  खुब ।
      ग़मो मे  भी   मग़र   बढ़ता रहा  है ।

      मिली तनहाइयां सच को यहाँ  पर ।
      अमादा  झूठ   वो  पलता  रहा  है ।

      मुहब्बत  मे  फिरौती हो  रही  अब ।
      जुबां से  चुप कोई  लुटता  रहा  है ।

      कमीनों   के   लिए  बरपी  वफ़ाई ।
      दिवाना   रात  भर  मरता  रहा  है ।

      गुनाहों  के   लिए   बेशक़   रिहाई ।
      इमानत को क़ज़ा मिलता  रहा  है ।

      जमाना दोगला "रकमिश  सताता ।
      शहादत   मांगता  छलता  रहा  है ।

                      रकमिश सुल्तानपुरी

                     

आइना उसको दिखाना चाहिए ।

""'''''''''''''''''''""""""""""""""ग़ज़ल""""""""''''"'''""""""""""""

      आग़  बदले  की  बुझाना  चाहिए ।
      हर किसी को  मुस्कुराना  चाहिए ।

      नफ़रतों से ज़ख़्म ही मिलता सदा ।
      रंजिशों  को  भूल   जाना  चाहिये ।

      जिंदगी बस चार दिन की चाँदनी  ।
      प्यार  से इसको  सजाना  चाहिए ।

      मंज़िलों को छोड़कर दहलीज़ पर ।
      फ़र्ज़  दुनियां  मे  चुकाना  चाहिए ।

      फ़र्क जिसको है नही सच झूठ का ।
      आइना   उसको  दिखाना  चाहिए ।

      छोड़कर अब  इश्क़ मे  हैवानियत ।
      दिल्लगी  दिल से  निभाना चाहिए ।

      हो रही "रकमिश  बड़ी  तौहीनियां ।
      अश्मिता  सबको  बचाना  चाहिए ।

                        रकमिश सुल्तानपुरी

सोमवार, 11 सितंबर 2017

दग़ा देने मुहब्बत के बहाने लोग निकले है ।

================ग़ज़ल=================

   दुनियां  के  रिवाजों को  भुलाने  लोग   बैठे   है ।
   नये ज़ख़्मो को देखो फ़िर दुखाने  लोग  बैठे  है ।

   ढहा रिश्तों कि दीवारें  वफ़ा की  खा रहें क़समें ।
   जुबां   मे  ख़ंजरों  को  ले  पुराने   लोग  बैठे  है ।

   बिकाऊँ हूं नही फिर भी बिका महसूस करता हूं ।
   ख़ुदा की भी यहाँ  क़ीमत  लगाने  लोग  बैठे  है ।

   भरोसा उठ गया  जबसे  यहां  हैवानियत  बरपी ।
   भरे   आँखों   मे  आंसू   को  छिपाने  लोग  बैठे ।

   नतीज़े आ रहे  बेशक़  रुआँसा  आदमी  मिलता ।
   सज़ा अपनी नफ़ासत का  चुकाने  लोग  बैठे  है ।

   रहेगा  ग़र   यही  मंज़र   बचेगा  आदिमा   हरसूं ।
   अभी   से  ग़मभरे  किस्से  सुनाने  लोग  बैठे  हैं ।

   कहां तक मै लिखू रकमिश कमीनी दास्ताँ इनकी ।
   दग़ा    देने   मुहब्बत   के  बहाने   लोग   बैठे   है । 

                           रकमिश सुल्तानपुरी

शुक्रवार, 8 सितंबर 2017

मुझे हर दर्द मालुम है दवा पाने नही निकला ।

  ================ग़ज़ल================

    तनिक आया हूँ गर्दिश में हवा खाने नही निकला ।
    ग़मो का लुफ़्त लेता हूँ वफ़ा  पाने  नही  निकला ।

    बड़े दिन बाद पाया हूँ दिवानों की  कोई महफ़िल ।
    दिवानापन उमड़ आया ज़फ़ा पाने नही  निकला ।

    झलक भर देख लेने से  दिवाना मत समझ  लेना ।
    गुमानी  कमसिनों की मै अदा पाने  नही निकला ।

    पुराने  हो गये  मसले  मग़र  हर  जख़्म  ताज़ा है ।
    मुझे  हर दर्द  मालुम है  दवा  पाने  नही  निकला ।

    नजऱ का तेज़ खंज़र वो छुपा है आज भी दिल में ।
    तड़पता ऱोज दिल है पर मज़ा पाने  नही निकला ।

    मुज़रिम  हूँ,  दिवाना  हूँ , बेगाना हूँ , आवारा  हूँ ।
    मारा  हूँ  मुक़द्दर  का  सजा  पाने  नही  निकला ।

    पता साहिल  का लेने ख़ुद गमों के  कारवां  आते ।
    मुहब्बत का  मसीहा हूं  ख़ुदा पाने  नही  निकला ।

    चला आया हूँ 'रकमिश'मैं लुटाने प्यार की दौलत ।
    मुझे है दर्द की ख़्वाहिश नफ़ा पाने  नही निकला ।

                .             @राम केश मिश्र

तू सुलगती आग तो शोला बना तैयार मैं हूं ।

================ग़ज़ल=================

    सोच मत लग जा गले से बेक़सक दिलदार  मैं  हूं ।
    तू  सुलगती  आग़   तो  शोला  बना  तैयार  मैं  हूं । 

    हो गयी काफ़ी  नशीहत  दर्द  गम  तनहाइयाँ  वो ।
    सुर्ख  होठो  पर   सजाने  के  लिए  सृंगार  मैं  हूं ।

    साहिलों की गर्दिशों मे  रह अकेला  उम्रभर अब ।
    दर्द,  गम,  तन्हाइयों  मे हो  गया  खूंखार  मै  हूं ।

    रौशनी  बनकर अंधेरी  रात मे आ  जा  सितमगर ।
    आ बुझा दे  आग  सारी  जल  रहा  अंगार  मैं  हूं ।

    तू तड़पकर  बेबसी  मे  जी  रही  होगी  यक़ीनन ।
    साहिलों पर छोड़  तन्हा  आ  समंदर  पार  मैं  हूं ।

    उम्रभर   यूँ   दूरियों   से  तप  गयी   मदहोशियाँ ।
    उस रूहानी आह  से पैदा  हुआ  किरदार  मैं  हूं ।

    आ मिलन की कश्मकश मे सामना पुरजोर होगा ।
    इश्क़ की गर धार तू तो  जिश्म की तलवार  मैं हूं ।

    तू तरस जाएगा "रकमिश' पा शबाबे -इश्क़  को ।
    हलचलें उठती रही उस झील का  मंझधार  मै हूं । 

                        Ram Kesh Mishra

मंगलवार, 5 सितंबर 2017

जहां मे ज्ञान का पौधा सदा बोता रहा शिक्षक ।

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    सजता राह जीवन की स्वंय खोता रहा शिक्षक ।
    जहां मे ज्ञान का पौधा सदा बोता रहा  शिक्षक ।

    हमारी एक ग़लती  पर  हमे  वो  डांटने  लगता ।
    दिखाकर राह सच झूठी सज़ा देता रहा शिक्षक ।

    मिले जो कामयाबी  तो वो पीठें  थपथपाता  है ।
    हमारी हार सुनकर के  दुखी होता रहा  शिक्षक ।

    बने हम नागरिक सच्चे  करें हम  देश की सेवा ।
    हमेशा  देश  भक्ति मे  हमे  धोता रहा  शिक्षक ।

    सिखाता पाठ जीवन के मिटाता अन्ध हृदय से ।
    महापुरुषों के साये को ख़ुदी ढ़ोता रहा शिक्षक ।

    पिता, माता ,सखा, भाई तनय सा प्यार देता  है ।
    सभी रिस्तो के सागर मे लगा गोता रहा शिक्षक ।

    करेंगे नाम दुनियां मे यही उम्मीद रख "रकमिश ।
    चिरंगुन हम बना  पंछी  हमे  सेता  रहा  शिक्षक । 

                         राम केश मिश्र
                     सुलतानपुर उत्तर प्रदेश

सोमवार, 4 सितंबर 2017

गीतिका। सच पे नित वार कर झगड़ा ।

गीतिका।तोटक छंद में ।

      सच पे  नित  वार  करे  झगड़ा ।
      तम का  अधिकार धरे  झगड़ा ।

      कलियोग  वियोग  बढ़े  विपदा ।
      सुख का  परकास  हरे  झगड़ा ।

      अपराध   कुकर्म  कुसंगति  से ।
      खल  रूप  अनेक  धरे  झगड़ा ।

      रहता   परिवार  दुखी   सबका ।
      जिसके घर  भोर  भये  झगड़ा ।

      घर   गाँव  सगे   सब  दूर   रहे ।
      मन  मे  विषभाव  भरे  झगड़ा ।

      बस नेह  भरो  नित जी वन  मे ।
      कुछ काम करो कि टरे झगड़ा । 

                         राम केश मिश्र

शनिवार, 2 सितंबर 2017

दर्द के ऐसे निवाले पल रहे है आज़कल ।

   ग़ज़ल । दर्द के ऐसे निवाले पल रहे है आज़कल ।

    सादगी मे  लोग  बेशक़ ढल रहे  है  आज़कल ।
    बेवफ़ाई  पर  यक़ीनन कर  रहे  है  आजकल ।

    झूठ की  दुनियां  बसाकर लूटने  की  साजिशें ।
    अश्क़ आंखों मे किसी के भर रहे है आज़कल ।

    रहनुमां  खूंखार   बाग़ी  मतलबी  बेईमान   से ।
    दे दख़ल हर जिंदगी मे  ख़ल रहे है  आज़कल ।

    आम जनता  नींद मे  बस  चल  रही है  रास्ता ।
    जागती  क़ानूनी  रश्में  गल  रही हैं  आज़कल ।

    बेबसी मे  जी  रहे  जो  इक  उजाले  के  लिए ।
    रात अंधेरी  उन्हें  भी  छल  रही  है  आज़कल । 

    आशिकों मे भर  रहा  है  वक़्त भी  हैवानियत ।
    प्यार की रश्में जहां मे  मर  रही  है  आज़कल ।

    मौत "रकमिश" हो गयी सस्ती यकीं तू मान ले ।
    दर्द  के  ऐसे  निवाले  पल  रहे   है  आज़कल । 

                              राम केश मिश्र
                         सुलतापुर उत्तर प्रदेश

गम से तेरे अभी तक रिहा न हुआ ।

    ग़ज़ल /गम से तेरे अभी तक रिहा न हुआ ।

      दर्द  दिल  का  वही   है  दवा  न  हुआ ।
      ग़म से  तेरे  अभी  तक  रिहा  न  हुआ ।

      हो    गयी   दूर    तेरी   वो   परछाइयाँ ।
      पर  यकीं  मान  लो  फ़ासला  न  हुआ । 

      तड़फड़ाता    रहा   उम्रभर   प्यार   मे ।
      फ़स  गयी  जिंदगी  मै  रिहा  न   हुआ ।

      सोच मत मै अकेला  हूं  अब  भी  यहां ।
      तेरे    जैसा   मेरा    दूसरा    न    हुआ ।

      आंसुओं  की  मुझे  फिक्र  बेशक़  नही ।
      तेरे   जाने   से  ज़्यादा , बुरा  न   हुआ ।

      आ चली  देख  ले  लुट  गयी   जिंदगी ।
      हार   करके   तुम्हे   जीतना  न   हुआ ।

       तू चली ही गयी छोड़ रकमिश को जब ।
       मन्ज़िले   ढ़ह   गयी   रास्ता   न  हुआ । 

                             राम केश मिश्र

बुधवार, 30 अगस्त 2017

सबका सुख दुख से नाता है ।

,गीतिका ।

    जो  जग मे  जीवन पाता  है ।
    भौतिकता मे  ढल  जाता  है ।

    राजा   हो  या  दुर्बल  निर्धन ।
    सब का सुख दुख से नाता है ।

    कष्टों मे  साहस  भर  दे  जो ।
    वह सच मे अपना  भ्राता  है ।

    नर तन पशु पंछी जड़ चेतन ।
    दुख   पाते  ही  मुरझाता  है ।

    जीवन इक सिक्का दो  पहलू ।
    रकमिश खुद को समझाता है ।

                     Ram Kesh Mishra

नशा ए इश्क

ग़ज़ल   नशा ए इश्क अब छोड़ा न जाए ।  जमाने से मगर उलझा न जाए ।   बड़ी मासूम हैं उसकी अदाएं,   कि मुझसे और अब देखा न जाए ।   गरीबों ...