सोमवार, 7 अगस्त 2017

दोस्ती के लिए मैं तरसता रहा ।

     ग़ज़ल। दोस्ती के लिये मैं तरसता रहा ।

      आशिक़ी के लिए आह  भरता रहा ।
      दोस्ती   के  लिए  मैं  तरसता  रहा ।

      वो मिली तो लगा पा  गया  मंज़िले ।
      मै ख़ुदा की तरफ़  रोज़ बढ़ता  रहा ।

      वो ख़ुमारी धरी की  धरी  रह  गयी ।
      झूठ सच से मुझे रोज  छलता  रहा ।

      हो गया  सामना  रूह  का  रूह  से ।
      फ़िर नशा प्यार का भी उतरता रहा ।

      चाँद समझा जिसे वो तो  अंगार था ।
      चांदनी के  लिये  हाथ  जलता  रहा ।

      जिंदगी भर  रही  गम  भरी  आहटें ।
      वक्त के  साथ  हर  दर्द  बढ़ता  रहा । 

      थाम रकमिश किसी ग़ैर की जिंदगी ।
      आँख के आंसुओं सा बिखरता रहा ।

                        @राम केश मिश्र

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