ग़ज़ल। दोस्ती के लिये मैं तरसता रहा ।
आशिक़ी के लिए आह भरता रहा ।
दोस्ती के लिए मैं तरसता रहा ।
वो मिली तो लगा पा गया मंज़िले ।
मै ख़ुदा की तरफ़ रोज़ बढ़ता रहा ।
वो ख़ुमारी धरी की धरी रह गयी ।
झूठ सच से मुझे रोज छलता रहा ।
हो गया सामना रूह का रूह से ।
फ़िर नशा प्यार का भी उतरता रहा ।
चाँद समझा जिसे वो तो अंगार था ।
चांदनी के लिये हाथ जलता रहा ।
जिंदगी भर रही गम भरी आहटें ।
वक्त के साथ हर दर्द बढ़ता रहा ।
थाम रकमिश किसी ग़ैर की जिंदगी ।
आँख के आंसुओं सा बिखरता रहा ।
@राम केश मिश्र
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