,,,,,,,,,,,,,,,,,(ग़ज़ल) ,,,,,,,,,,,,,,,,,,,
इश्क़ का हर फ़ासला ऐ वफ़ा दस्तूर है ।
दर्द भी हिस्से का तेरे अब मुझे मंजूर है ।
देखता हूं शक़्ल तेरी ले चिरागा रात भर ।
है नही ख़ुद की ख़बर आशिक़ी मे चूर है ।
बात सुन ख़ामोश तेरी ये अदायें हो गयी ।
अश्क़ आंखों के हमारे भी हुये मजबूर हैं ।
आ सको तो देख लेना ग़म भरी तनहाइयाँ ।
आज़कल जख़्मे निशाँ सब हो गयें नासूर हैं ।
रफ़्ता रफ़्ता इश्क मे गम करवटें लेने लगा ।
पर मज़ा दिल को मेरे मिल रहा भरपूर है ।
मंज़िले आग़ोश मे ठहरी हुई है बेसबब ।
रासते क़दमों मे मेरे आपसे कुछ दूर हैं ।
टूट जाना है नही 'रकमिश' कोई दीवानगी ।
इल्म है तो इश्क़ का ग़म भी मुझे काफ़ूर है ।
@ राम केश मिश्र
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