रविवार, 6 अगस्त 2017

दर्द हिस्से का तेरे अब मुझे मंजूर है ।

      ,,,,,,,,,,,,,,,,,(ग़ज़ल) ,,,,,,,,,,,,,,,,,,,

      इश्क़ का हर  फ़ासला  ऐ  वफ़ा  दस्तूर   है ।
      दर्द भी  हिस्से  का  तेरे अब  मुझे  मंजूर है ।

      देखता हूं शक़्ल  तेरी ले  चिरागा  रात  भर ।
      है नही ख़ुद की  ख़बर आशिक़ी  मे  चूर है ।

      बात सुन  ख़ामोश तेरी ये अदायें  हो  गयी ।
     अश्क़ आंखों के हमारे भी हुये  मजबूर  हैं । 

      आ सको तो देख लेना ग़म भरी  तनहाइयाँ ।
      आज़कल जख़्मे निशाँ सब हो गयें नासूर हैं ।

      रफ़्ता  रफ़्ता इश्क मे गम करवटें  लेने लगा ।
      पर मज़ा दिल  को मेरे मिल  रहा भरपूर  है ।

      मंज़िले आग़ोश  मे  ठहरी  हुई  है  बेसबब ।
      रासते  क़दमों मे मेरे आपसे   कुछ  दूर  हैं ।

      टूट जाना है नही 'रकमिश' कोई  दीवानगी ।
      इल्म है तो इश्क़ का ग़म भी मुझे काफ़ूर है । 

                          @ राम केश मिश्र

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