शनिवार, 30 अप्रैल 2016

ग़ज़ल।मुहब्बत अब नही होती।

           ग़ज़ल।मुहब्बत अब नही होती ।

ग़मो के बढ़ गये आलम शहादत अब नही होती ।
यकीं मानो निगाहों तक मुहब्बत अब नही होती ।।

वही साकी वही हमदम वही हमराह हमदिल हैं ।
वही दर्दो के पैमाने शरारत अब नही होती ।।

कहूँ क्या हाल मैं तुमसे निग़ाहों की तबाही का ।
लुटा हर बार महफ़िल में शिकायत अब नही होती ।।

बड़ी तकलीफ़ देती थी पुरानी दर्द तन्हाई ।
वही लम्हें बेक़ाबू पर हरारत अब नही होती ।।

कभी हमआम थे हम भी मुहब्बत के ईशारों से ।।
मग़र बदनाम करने की आदत अब नही होती ।।

किसी के दिल के ज़ख्मो की दवा कैसे करेंगे अब ।
अपने दिल खुद मुझसे हिफ़ाजत अब नही होती ।।

सजाएँ मौत थी सस्ती तेरे 'रकमिश ,खफाई से ।
मिली है बादसाहत पर हुकूमत अब नही होती है ।।

                          राम केश मिश्र(रकमिश)

शनिवार, 23 अप्रैल 2016

ग़ज़ल।किसी का दिल दुखाने तक।

      ग़ज़ल।किसी का दिल दुखाने तक।

रदीफ़--तक ।
काफ़िया--निसाने,फ़साने,जलाने,घराने आदि ।

मतला--
दफ़न होंगे ज़बाने में गुनाहों के निसाने तक ।
हक़ीक़त की जुबाँ होगी बयां होंगे फ़साने तक ।।

शेर--
मसालें रंज की नफ़रत बुझाकर देख ऐ हमदम ।
खुदा हासिल जरू होगा वफ़ा की शै जलाने तक ।।

ज़िगर नापाक न हो तो ग़रीबी क्या अमीरी क्या ।
वरना ख़ाक़ ही बचता निसां उनके घराने तक ।।

क़सम खाकर करो वादे सुकूने इश्क़ से पहले ।
मग़र यूँ तोड़ मत डालो इसे हरगिज़ निभाने तक ।।

कमाई ज़िंदगी हमने बड़े ही नेक करतब से ।
गवां देते मग़र बेसक बची दौलत कमाने तक ।।

इलाही की इबादत से मिला दो चार दिन ही है ।
मुहब्बत बाट कर जाना ज़बाने में बुलाने तक ।।

रचाकर मौत की साज़िस बुराई जीतती आयी ।
बुरा होना तो मत होना किसी का दिल दुखाने तक ।

मकता--
लगा जो आग़ हँसते है कभी गैरों के घर रकमिश ।
जलेंगे एक दिन मसलन उनके आशियाने तक  ।।

                        ©राम केश मिश्र(रकमिश)

गुरुवार, 21 अप्रैल 2016

ग़ज़ल।खुद को मिटाया तो नही जाता ।

    ग़ज़ल खुद को मिटाया तो नही जाता ।

मुहब्बत में किया वादा निभाया तो नही जाता ।
वफ़ा की चाह में दिल को दुखाया तो नही जाता ।।

चलो हम मान लेते है कि हम ही बेवफ़ा निकले ।
मग़र ये प्यार का लम्हा बिताया तो नही जाता ।।

तुम्हे भी याद होगें वो तेरे मासूमियत के दिन ।
बहे जो आँख के पानी छुपाया तो नही जाता ।।

गये जब छोड़ मुझको तुम किसी के आशियाने में ।
करूँ मैं लाख़ कोशिस पर भुलाया तो नही जाता ।।

करेगा फ़ैसला इक दिन खुदा खुद की अदालत में ।
वफ़ा का दाम दुनिया में चुकाया तो नही जाता ।।

सहेंगे ग़म के खंजर तक तुम्हारे इश्क़ में बेसक ।
मग़र हर बार ही खुद को मिटाया तो नही जाता ।।

मुझे मालूम था इक दिन लुटेगी दिल की ये महफ़िल ।
वफ़ा के नाम पर सब कुछ लुटाया तो नही जाता ।।

तुम्हे जाना है रकमिश' तो चले जाओ सकूँनत में ।
लगी जो आग दिल में तो बुझाया तो नही जाता ।।

                        © राम केश मिश्र (रकमिश)

बुधवार, 13 अप्रैल 2016

ग़ज़ल।खुदा खुद की मुहब्बत का।

ग़ज़ल।खुदा खुद की मुहब्बत का।

रदीफ़ -का
काफ़िया -मुरौव्वत,हक़ीक़त,हुकूमत,कीमत,आदि

मतला-
फ़ना कर उम्रभर देखो तमाशा बेमुरौव्वत का ।
पता फिर भी नही मिलता मुहब्बत में हक़ीक़त का ।
शेर-
लगेगी एक दिन ठोकर भरोसा टूट जायेगा ।
जुनूँ बेदम पड़ा होगा वफ़ाओं पर हुकूमत का ।।

मिलेगा शख़्स हर कोई वफ़ा में दर्द का मारा ।
लेकर फ़िर रहा होगा तमन्ना वो नशीहत का ।

महज़ काफ़ी नही होता दिलों पर हाथ रख देना ।
मिलेगा सब्र कर सब को सही अंजाम नीयत का ।।

करोगें तुम वफ़ा हर दिन मिलेगा एक दिन धोखा ।
न कोई दाम देगा फ़िर तेरे ग़म की वशीयत का ।।

मुक़दमे बेहयाई में गवाही की ज़रूरत क्या । 
निगाहें फ़ैसला करतीं यहाँ दिल क़ी तबीयत का ।

मकता-
भरा शैलाब मिलता है उन्हीं आँखों में अब 'रकमिश"
जिन्हें हम मान बैठे थे खुदा खुद की मुहब्बत का ।।

                       ©राम केश मिश्र(रकमिश)

शनिवार, 9 अप्रैल 2016

ग़ज़ल।यहा शोहरत नही मिलती ।

      ग़ज़ल।यहाँ शोहरत नही मिलती ।

रदीफ़--नही मिलती
काफ़िया--राहत चाहत शोहरत फुरसत आदि

मतला--
मिलेगी दर्द की महफ़िल कभी चाहत नही मिलती ।
दवा हर मर्ज की हाजिर मग़र राहत नही मिलती ।

शेर--
मिला जो रहनुमाई में तजुर्बा बेअसर निकला ।
मुहब्बत में तजुर्बो को यहाँ शोहरत नही मिलती ।

ज़रा सोचो करोगे क्या मेरे इस गम के हिस्से का ।
तुम्हे तो गैर के शाये से ही फ़ुरसत नही मिलती ।।

रहूँ ख़ामोश मज़बूरन मुहब्बत मत समझ लेना ।
बयां कर दूँ हक़ीक़त तो यहाँ इज्जत नही मिलती ।

किसी मासूम दिल पर क्यों लुटा दू ग़म का ये तूफाँ ।
लगा दू आग़ खुशिओं में lदिले हसरत नही मिलती ।।

न देखो आँख के आँसू सितम होगा तो निकलेगे   ।
वफ़ा पाया नही फ़िर भी यहा नफ़रत नही मिलती ।।

मकता--
निगाहें प्यार की "रकमिश" चुराता था कि आदी था ।
अब तो आँख के आँशू से ही मोहलत नही मिलती ।।

                   राम केश मिश्र"रकमिश"

बुधवार, 6 अप्रैल 2016

ग़ज़ल।दिवाने रोज़ आते है।

         ग़ज़ल ॥दिवाने रोज आते है ।

निगाहें प्यार में सपने सुहाने रोज आते है ।
यहाँ साहिल की महफ़िल में दिवाने रोज आते है ।

हुये नाक़ाम बेबस है दिलों को चाहने वाले ।
लगा जो प्यार में ठोकर भुलाने रोज आते है ।

बिछड़कर दर्द के मारे सकूने फ़र्ज़ के ख़ातिर ।
मिली जो इश्क़ की क़ीमत चुकाने रोज़ आते है ।

भले हैं अज़नबी लेकिन बड़े ही नेक दिल वाले ।
किया हरहाल में वादा निभाने रोज़ आते है ।

अग़र मौक़ा मिले तुम भी चले आवो गुजारिस है ।
वफ़ा में बेवफा अक़्सर पुराने रोज़ आते है ।

बनेगा अज़नबी कोई तेरे दिल का मसीहा भी ।
अभी तो आप जैसे दिल दुखाने रोज आते है ।

कभी"रकमिश"दिखायेंगे दिलों के जख़्म तुमको भी । 
खुदी के ग़म में डूबे हम नहाने ऱोज आते है ।। 

                             राम केश मिश्र(रकमिश)

शनिवार, 26 मार्च 2016

ग़ज़ल।वही तेरी कहानी है।

    ग़ज़ल।वही तेरी कहानी है ।

किया गर दोस्ती हूँ तो यकीं मानो निभानी है । 
महफ़िल में रवां होकर मुझे मंजिल बनानी है ।

कहूँ मैं अज़नबी कैसे अगर तुम साथ मेरे हो ।
वही तेरी कहानी है वही मेरी कहानी है ।

जरा मैं दूर हूँ तो क्या मेरी साँसों से आ पूंछो ।
दिलो में दर्द है ठहरा छुपा आँखों में पानी है ।

न सोचों छोड़ महफ़िल को चले हम दूर जायेंगे । 
हमे भी दोस्ती की अब कोई क़ीमत चुकानी है ।

मेरे ख़ामोस रहने की कोई मजबूरियां होगी ।
मग़र हरहाल इस दिल की तुम्हे आहें सुनानी है।

महज़ दो चार दिन तक ही खुदी को रोक पाऊँगा ।
कहा न एक मानेगी बड़ी बेबस जवानी है।।

तरस आँखे भी जाती है तेरे दीदार को "रकमिश"
कहूँ क्या दर्द ही होगा वही यांदें पुरानी है ।

                     ©  रकमिश सुल्तानपुरी

शुक्रवार, 25 मार्च 2016

ग़ज़ल।कीमत चुकाई तो नही जाती।

ग़ज़ल।कीमत चुकाई तो नही जाती।

रदीफ़-तो नही होती ।
काफ़िया--दिखाई चुकाई लुटाई बताई निभाई गवांई मिटाई भुलाई ।

मतला-
अदाओं की कशिश हर पल दिखाई तो नही जाती ।
वफ़ाओं की सदा क़ीमत चुकाई तो नही जाती ।।

शेर-
अमानत आपकी ही है जिसे चाहो निशाँ कर दो ।
मग़र हर शख़्स पर इज्ज़त लुटाई तो नही जाती ।

तेरे क़िरदार में झांका मुहब्बत हो गयी मुझको ।
मग़र हर बात दिल की अब बताई तो नही जाती ।।

मुक़र जाना ही वाज़िब था दिखा मासूम वो चेहरा ।
गमों में ली गयी कश्मे निभाई तो नही जाती ।।

तरस खाकर करोगे क्या मेरी मासूमियत पर तुम ।
कभी ख़ैरात में चाहत गवांई तो नही जाती ।।

तेरे ख्वाबो के वारिश हम लवारिश हो गये देखो ।
यूँ ही जिंदगी तुम पर अपनी मिटाई तो नही जाती ।।

मकता-
भले हो बेवफ़ा कोई यहाँ दिल तोड़कर "रकमिश" ।
मग़र यादें मुहब्बत की भुलाई तो नही जाती ।। 

                       रकमिश सुल्तानपुरी

शनिवार, 19 मार्च 2016

ग़ज़ल।वफ़ा के नाम पर ।

   ग़ज़ल ।वफ़ा के नाम पर मैंने।

काफ़िया- लुटाई,जुदाई,मिलाई,निभाई आदि ।
रदीफ़-समझ पाया ।

मतला-
वफ़ा के नाम पर दुनियां लुटाई तो समझ पाया ।
मुहब्बत में मिली मुझको जुदाई तो समझ पाया ।।

शेर--
यहाँ ख़ामोश रहने पर निगाहें तक चुरा लेगे ।
भरे अश्कों से जब आँखे मिलाई तो समझ पाया ।।

यक़ीनन हो ही जाता है दिले सौदा सराफत का ।
यहा रिस्तो की क़ीमत जब निभाई तो समझ पाया ।।

ख़्वाब मैंने भी पाले थे सुनहरे याद के सपने ।
मिली राहे मुहब्बत पर तन्हाई तो समझ पाया ।। 

न ग़र्दिश है , न बंदिश है , न रंजिश है,न रंजोगम ।
मिली न माँगकर देखा रिहाई तो समझ पाया ।।

मकता--
वहम था उम्रभर मुझको किसी के प्यार का "रकमिश"।
जुबां तक बात दिल की जो आयी तो समझ पाया ।। 

              --रकमिश सुल्तानपुरी

बुधवार, 9 मार्च 2016

ग़ज़ल।मुहब्बत हो गयी होगी ।

    गज़ल।मुहब्बत हो गयी होगी ।
                 (16,18'1,20,13,1)

नज़र की बेकसी दिल को शिनाखत हो गयी होगी ।
अशिलियत तुम छिपाओ पर मुहब्बत हो गयी होगी ।।

तेरी नाजुक नज़ाक़त पर ज़माना शक़ जताता था ।
अग़र तुम माफ़ कर देना शरारत हो गयी होगी ।।

मुझे अफ़सोस चुप मैं था तेरी मासूम हरक़त पर ।
नज़र तुमने जो पलटी है शिक़ायत हो गयी होगी ।।

ज़माने की तो आदत है बुराई प्यार की करना ।
तुम्हारे दिल लगाने पर नफ़ासत हो गयी होगी ।

लगाकर छोड़ आया हूँ दिलों में दिल का इक पौधा ।
मुझे मालूम है दिल की हिफ़ाजत हो गयी होगी ।।

कहा तक ख़्वाब मैं बुनता तुम्हारे उन इशारों का ।
मेरी ख़ामोशियों की भी मिलावट हो गयी होगी  ।।

मुझे तकलीफ़ है चेहरा नजऱ भर कर नही देखा ।
मग़र चेहरे से नज़रों की रफ़ाक़त हो गयी होगी ।

महज़ दो चार दिन की ये मिली जो प्यार की दौलत।
तुम्हारी याद में ग़म की दावत हो गयी होगी ।।

ज़रा सा प्यार देकरके रवाना हो गये "रकमिश" ।
'मुकद्दर भी बदलता है?" कहावत हो गयी होगी ।।

                      ©रकमिश सुल्तानपुरी

                                  ©©©

नशा ए इश्क

ग़ज़ल   नशा ए इश्क अब छोड़ा न जाए ।  जमाने से मगर उलझा न जाए ।   बड़ी मासूम हैं उसकी अदाएं,   कि मुझसे और अब देखा न जाए ।   गरीबों ...