शनिवार, 19 मार्च 2016

ग़ज़ल।वफ़ा के नाम पर ।

   ग़ज़ल ।वफ़ा के नाम पर मैंने।

काफ़िया- लुटाई,जुदाई,मिलाई,निभाई आदि ।
रदीफ़-समझ पाया ।

मतला-
वफ़ा के नाम पर दुनियां लुटाई तो समझ पाया ।
मुहब्बत में मिली मुझको जुदाई तो समझ पाया ।।

शेर--
यहाँ ख़ामोश रहने पर निगाहें तक चुरा लेगे ।
भरे अश्कों से जब आँखे मिलाई तो समझ पाया ।।

यक़ीनन हो ही जाता है दिले सौदा सराफत का ।
यहा रिस्तो की क़ीमत जब निभाई तो समझ पाया ।।

ख़्वाब मैंने भी पाले थे सुनहरे याद के सपने ।
मिली राहे मुहब्बत पर तन्हाई तो समझ पाया ।। 

न ग़र्दिश है , न बंदिश है , न रंजिश है,न रंजोगम ।
मिली न माँगकर देखा रिहाई तो समझ पाया ।।

मकता--
वहम था उम्रभर मुझको किसी के प्यार का "रकमिश"।
जुबां तक बात दिल की जो आयी तो समझ पाया ।। 

              --रकमिश सुल्तानपुरी

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