सोमवार, 7 मार्च 2016

गज़ल।दर्द वो बोती रही ।

        गज़ल।दर्द वो बोती रही।

इश्क़ के हालात को खोती रही ।
जिन्दगी में दर्द वो बोती रही ।

पास आया था लिए बेबाकिया ।
वक्त उसको न मिला सोती रही ।।

मिल सकी न प्यार की परछाइयाँ ।
बेबस आँखे गमसुदा रोती रही ।

बेसक सजी थी उम्रभर तन्हाइयां ।
हार दिल की हर तरफ होती रही । 

एक पल मिलना मुक़र्रर न हुआ ।
बेरुखी की बात वो ढोती रही ।

जख़्म गहरा हो चला'रकमिश"तेरा ।
जब मिली बस दर्द से धोती रही । 

                रकमिश सुल्तानपुरी

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