शनिवार, 27 फ़रवरी 2016

ग़ज़ल।दर्द मुझको भी ।

ग़ज़ल।दर्द मुझको भी ।

साहिलों पर खो गया तो क्या हुआ ।
बेवफ़ा मैं हो गया तो क्या हुआ ।

अश्क़ में डूबे हुये थे रात दिन ।
जख़्म खुद के धो गया तो क्या हुआ ।

है यक़ीनन वक़्त की बंदिश यहाँ ।
दिल लगा के खो गया तो क्या हुआ ।

ग़म उठा देखा; मिला न कुछ हमे ।
मुस्कराएं है ज़रा तो क्या हुआ ।

जो दिया तन्हाइयो में हौसला ।
दर्द में ग़म बो गया तो क्या हुआ ।

दर्द मुझको भी हुआ होगा कभी ।
आज तुमको हो गया तो क्या हुआ ।
                     

                  ©रकमिश सुल्तानपुरी

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