सोमवार, 8 फ़रवरी 2016

ग़ज़ल साहिल ।तालाश ये साहिल

ग़ज़ल साहिल ।तलाश ऐ साहिल ।

  आप ग़ज़ल कैसे लिखते हो ? यही लब्ज़ होते है ;मेरे हमसफ़र हमदिलों के । माफ़ी मांगने का हक़ भी मुझे नही है । मुख़ातिब हो नही पाता । मग़र उन्हें इल्तिला कर दू क़ि दीवाना बनना ही पड़ेगा । ये इश्क़ है । दीवानगी है । जन्नते-सुरूर है । ये खुद ख़ुदा का ख़ुमार है । जो बेकसी है , प्यार है । और इस प्यार का आग़ाजनाज़ुक उम्र से निगाहों की तपन से मज़बूर । ख्वाहिशों के सफ़र में ऱप्ता ऱप्ता साहिलों पर फ़िसलते क़दम । रिस्तों की सुरुआत । वो अज़नबी और फ़िर चाहतों का अनजाना सैलाब । वो मदहोश चितवन । 

रात में बनती तस्वीरें । और तसवीरों पर सजी मुस्कान । वो बेख़ौफ़ इशारे । अकेलेपन की बेवसी । तब जाकर सुरु होती है दास्ताँ ऐ मुहब्बत । खिलते फूल और गुनगुनाती शाम । शाम ही नही ,अंधेरों के झरोखें उकेरते है वो चेहरा जिसकी चाहत है । यहा से सुरु होती है तालाश ऐ जिंदगी । यही से भटकती है राहे । यही से मिलती है जन्नते-झलक । इस नये एहशास का वज़्न दिल को तसल्ली देता है । अग़र मुलाकातों का सिलसिला जाऱी रहा तो शख़्स दर शख़्स आजमाइसो के दौर का भी आगाज़ यही से होता है । और तब निकलती है एक आह एक तड़पन । और तब बनती है ग़ज़ल ।।
           
समन्दर डूब सब निकले बैठे हम किनारे थे ।
बुझी न प्यास ऐ साकी इशारे ही इशारे थे ।।

  शेष फिर........
               .... रकमिश सुल्तानपुरी

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