ग़ज़ल।जिंदगी झूठी लगी ।
रूप तेरा जो खिला तो रोशनी झूठी लगी ।
एक दिन तुम मिल गये क्या ज़िन्दगी झूठी लगी ।।
लाखों चेहरे दे गये झाँसा मुझे मासूम बन ।
जो मिली बेदाग़ मुझको ,सादगी झूठी लगी ।।
लम्हा लम्हा उम्रभर प्यार में क़ायल रहा पर
जो झुकी तेरी नज़र हर बन्दगी झूठी लगी ।।
साहिलों को ही समझ बैठा था मंजिल यार मैं ।
इश्क़ की सारी मसक्कत तश्नगी झूठी लगी ।।
देखता हूँ आपके माफ़िक़ सकूँनत न मिली ।
आप ही आये चले तो हर हँसी झूठी लगी ।।
थी क़सिस 'रकमिश' निगाहे प्यार में ज़ब भी मिलीं ।
उफ़!! तुम्हारी ये क़सिस हर बेबसी झूठी लगी ।।
©©©राम केश मिश्र
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