ग़ज़ल।क़हर बरपा नफ़ासत का।
वतन के रहबरों सुन लो क़हर बरपा नफ़ासत का ।
मचा कोहराम है ,ग़र्दिश सियासत में बग़ावत का ।
निगाहें क्या गवाही दें यहा बस लूट के मंज़र ।
नज़र आता नही जब तब जबाना वो सराफत का ।
ग़बन के खेल रच करके बने बैठे है सौदागर ।
सौदा रहनुमां करते लिए ज़िम्मा शराफ़त का ।
करे जो शख़्स ग़द्दारी नही वो मुल्क़ के क़ाबिल ।
मिले अंजाम रब को भी गुनाहों का, शरारत का ।
लगा न दाग़ दामन में लिखी है मौत तेरी भी ।
ज़रा तू शान से जी ले करेगा क्या अमानत का ।
सुनो ऐ हमसफ़र 'रकमिश' इरादें तुम बदल देखो ।
सकूनत मिल ही जायेगी असर होगा मुहब्बत का ।
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