ग़ज़ल।एक दिन का प्यार था।
उम्र भर की दोस्ती में एक दिन का प्यार था।
हमसफ़र था संगदिल, बेवफा बेकार था ।।
चाहतों के बीच में ही पल रही थी दूरियाँ ।
इश्क़ की उस बेरुख़ी का हो गया एतबार था ।
एक पैमानें की ख़्वाहिश में ज़ला है दिल मेरा ।
किश्तियाँ भी डूबती रह गयी, मझधार था ।।
ग़ैर के शाये में जाकर मुस्कराने वे लगे ।
हो गये तबसे ज़ुदा वो आख़िरी दीदार था ।।
दिल की धड़कन ले गये वे तोड़कर इस रूह से ।
थी ख़ुसी उस पार जबकि ग़म रुका इस पार था ।।
तिनका तिनका जल गया वह था घरौंदा एक ही ।
आंशुओं के सींचने से जो कभी तैयार था।।
ग़म के अँधियारे मिले है आज तन्हा साहिलों पर ।
डूबने किश्ती लगी पर दर्द बरकरार था ।।
रह गयी थी रश्म "रकमिश" याद की तन्हाइयों में ।
बस निभाता रहा मैं बेरुखा किरदार था।।
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