शनिवार, 26 मार्च 2016

ग़ज़ल।वही तेरी कहानी है।

    ग़ज़ल।वही तेरी कहानी है ।

किया गर दोस्ती हूँ तो यकीं मानो निभानी है । 
महफ़िल में रवां होकर मुझे मंजिल बनानी है ।

कहूँ मैं अज़नबी कैसे अगर तुम साथ मेरे हो ।
वही तेरी कहानी है वही मेरी कहानी है ।

जरा मैं दूर हूँ तो क्या मेरी साँसों से आ पूंछो ।
दिलो में दर्द है ठहरा छुपा आँखों में पानी है ।

न सोचों छोड़ महफ़िल को चले हम दूर जायेंगे । 
हमे भी दोस्ती की अब कोई क़ीमत चुकानी है ।

मेरे ख़ामोस रहने की कोई मजबूरियां होगी ।
मग़र हरहाल इस दिल की तुम्हे आहें सुनानी है।

महज़ दो चार दिन तक ही खुदी को रोक पाऊँगा ।
कहा न एक मानेगी बड़ी बेबस जवानी है।।

तरस आँखे भी जाती है तेरे दीदार को "रकमिश"
कहूँ क्या दर्द ही होगा वही यांदें पुरानी है ।

                     ©  रकमिश सुल्तानपुरी

शुक्रवार, 25 मार्च 2016

ग़ज़ल।कीमत चुकाई तो नही जाती।

ग़ज़ल।कीमत चुकाई तो नही जाती।

रदीफ़-तो नही होती ।
काफ़िया--दिखाई चुकाई लुटाई बताई निभाई गवांई मिटाई भुलाई ।

मतला-
अदाओं की कशिश हर पल दिखाई तो नही जाती ।
वफ़ाओं की सदा क़ीमत चुकाई तो नही जाती ।।

शेर-
अमानत आपकी ही है जिसे चाहो निशाँ कर दो ।
मग़र हर शख़्स पर इज्ज़त लुटाई तो नही जाती ।

तेरे क़िरदार में झांका मुहब्बत हो गयी मुझको ।
मग़र हर बात दिल की अब बताई तो नही जाती ।।

मुक़र जाना ही वाज़िब था दिखा मासूम वो चेहरा ।
गमों में ली गयी कश्मे निभाई तो नही जाती ।।

तरस खाकर करोगे क्या मेरी मासूमियत पर तुम ।
कभी ख़ैरात में चाहत गवांई तो नही जाती ।।

तेरे ख्वाबो के वारिश हम लवारिश हो गये देखो ।
यूँ ही जिंदगी तुम पर अपनी मिटाई तो नही जाती ।।

मकता-
भले हो बेवफ़ा कोई यहाँ दिल तोड़कर "रकमिश" ।
मग़र यादें मुहब्बत की भुलाई तो नही जाती ।। 

                       रकमिश सुल्तानपुरी

शनिवार, 19 मार्च 2016

ग़ज़ल।वफ़ा के नाम पर ।

   ग़ज़ल ।वफ़ा के नाम पर मैंने।

काफ़िया- लुटाई,जुदाई,मिलाई,निभाई आदि ।
रदीफ़-समझ पाया ।

मतला-
वफ़ा के नाम पर दुनियां लुटाई तो समझ पाया ।
मुहब्बत में मिली मुझको जुदाई तो समझ पाया ।।

शेर--
यहाँ ख़ामोश रहने पर निगाहें तक चुरा लेगे ।
भरे अश्कों से जब आँखे मिलाई तो समझ पाया ।।

यक़ीनन हो ही जाता है दिले सौदा सराफत का ।
यहा रिस्तो की क़ीमत जब निभाई तो समझ पाया ।।

ख़्वाब मैंने भी पाले थे सुनहरे याद के सपने ।
मिली राहे मुहब्बत पर तन्हाई तो समझ पाया ।। 

न ग़र्दिश है , न बंदिश है , न रंजिश है,न रंजोगम ।
मिली न माँगकर देखा रिहाई तो समझ पाया ।।

मकता--
वहम था उम्रभर मुझको किसी के प्यार का "रकमिश"।
जुबां तक बात दिल की जो आयी तो समझ पाया ।। 

              --रकमिश सुल्तानपुरी

बुधवार, 9 मार्च 2016

ग़ज़ल।मुहब्बत हो गयी होगी ।

    गज़ल।मुहब्बत हो गयी होगी ।
                 (16,18'1,20,13,1)

नज़र की बेकसी दिल को शिनाखत हो गयी होगी ।
अशिलियत तुम छिपाओ पर मुहब्बत हो गयी होगी ।।

तेरी नाजुक नज़ाक़त पर ज़माना शक़ जताता था ।
अग़र तुम माफ़ कर देना शरारत हो गयी होगी ।।

मुझे अफ़सोस चुप मैं था तेरी मासूम हरक़त पर ।
नज़र तुमने जो पलटी है शिक़ायत हो गयी होगी ।।

ज़माने की तो आदत है बुराई प्यार की करना ।
तुम्हारे दिल लगाने पर नफ़ासत हो गयी होगी ।

लगाकर छोड़ आया हूँ दिलों में दिल का इक पौधा ।
मुझे मालूम है दिल की हिफ़ाजत हो गयी होगी ।।

कहा तक ख़्वाब मैं बुनता तुम्हारे उन इशारों का ।
मेरी ख़ामोशियों की भी मिलावट हो गयी होगी  ।।

मुझे तकलीफ़ है चेहरा नजऱ भर कर नही देखा ।
मग़र चेहरे से नज़रों की रफ़ाक़त हो गयी होगी ।

महज़ दो चार दिन की ये मिली जो प्यार की दौलत।
तुम्हारी याद में ग़म की दावत हो गयी होगी ।।

ज़रा सा प्यार देकरके रवाना हो गये "रकमिश" ।
'मुकद्दर भी बदलता है?" कहावत हो गयी होगी ।।

                      ©रकमिश सुल्तानपुरी

                                  ©©©

सोमवार, 7 मार्च 2016

गज़ल।दर्द वो बोती रही ।

        गज़ल।दर्द वो बोती रही।

इश्क़ के हालात को खोती रही ।
जिन्दगी में दर्द वो बोती रही ।

पास आया था लिए बेबाकिया ।
वक्त उसको न मिला सोती रही ।।

मिल सकी न प्यार की परछाइयाँ ।
बेबस आँखे गमसुदा रोती रही ।

बेसक सजी थी उम्रभर तन्हाइयां ।
हार दिल की हर तरफ होती रही । 

एक पल मिलना मुक़र्रर न हुआ ।
बेरुखी की बात वो ढोती रही ।

जख़्म गहरा हो चला'रकमिश"तेरा ।
जब मिली बस दर्द से धोती रही । 

                रकमिश सुल्तानपुरी

शनिवार, 27 फ़रवरी 2016

ग़ज़ल।दर्द मुझको भी ।

ग़ज़ल।दर्द मुझको भी ।

साहिलों पर खो गया तो क्या हुआ ।
बेवफ़ा मैं हो गया तो क्या हुआ ।

अश्क़ में डूबे हुये थे रात दिन ।
जख़्म खुद के धो गया तो क्या हुआ ।

है यक़ीनन वक़्त की बंदिश यहाँ ।
दिल लगा के खो गया तो क्या हुआ ।

ग़म उठा देखा; मिला न कुछ हमे ।
मुस्कराएं है ज़रा तो क्या हुआ ।

जो दिया तन्हाइयो में हौसला ।
दर्द में ग़म बो गया तो क्या हुआ ।

दर्द मुझको भी हुआ होगा कभी ।
आज तुमको हो गया तो क्या हुआ ।
                     

                  ©रकमिश सुल्तानपुरी

शनिवार, 20 फ़रवरी 2016

ग़ज़ल।क़हर बरपा नफ़ासत का।

   ग़ज़ल।क़हर बरपा नफ़ासत का।

वतन के रहबरों सुन लो क़हर बरपा नफ़ासत का ।
मचा कोहराम है ,ग़र्दिश सियासत में बग़ावत का ।

निगाहें क्या गवाही दें यहा बस लूट के मंज़र ।
नज़र आता नही जब तब जबाना वो सराफत का ।

ग़बन के खेल रच करके बने बैठे है सौदागर ।
सौदा रहनुमां करते लिए ज़िम्मा शराफ़त का ।

करे जो शख़्स ग़द्दारी नही वो मुल्क़ के क़ाबिल ।
मिले अंजाम रब को भी गुनाहों का, शरारत का ।

लगा न दाग़ दामन में लिखी है मौत तेरी भी ।
ज़रा तू शान से जी ले करेगा क्या अमानत का ।

सुनो ऐ हमसफ़र 'रकमिश' इरादें तुम बदल देखो ।
सकूनत मिल ही जायेगी असर होगा मुहब्बत का ।

                      ©©©

शुक्रवार, 19 फ़रवरी 2016

ग़ज़ल।जिंदगी झूठी लगी ।

     ग़ज़ल।जिंदगी झूठी लगी ।

रूप तेरा जो खिला तो रोशनी झूठी लगी ।
एक दिन तुम मिल गये क्या ज़िन्दगी झूठी लगी ।।

लाखों चेहरे दे गये झाँसा मुझे मासूम बन ।
जो मिली बेदाग़ मुझको ,सादगी झूठी लगी ।।

लम्हा लम्हा उम्रभर प्यार में क़ायल रहा पर
जो झुकी तेरी नज़र हर बन्दगी झूठी लगी ।।

साहिलों को ही समझ बैठा था मंजिल यार मैं ।
इश्क़ की सारी मसक्कत तश्नगी झूठी लगी ।।

देखता हूँ आपके माफ़िक़ सकूँनत न मिली ।
आप ही आये चले तो हर हँसी झूठी लगी ।।

थी क़सिस 'रकमिश' निगाहे प्यार में ज़ब भी मिलीं ।
उफ़!! तुम्हारी ये क़सिस हर बेबसी झूठी लगी ।।

                     ©©©राम केश मिश्र

मंगलवार, 16 फ़रवरी 2016

ग़ज़ल।एक दिन का प्यार था ।

      ग़ज़ल।एक दिन का प्यार था।

उम्र भर की दोस्ती में एक दिन का प्यार था।
हमसफ़र था संगदिल, बेवफा बेकार था ।।

चाहतों के बीच में ही पल रही थी दूरियाँ ।
इश्क़ की उस बेरुख़ी का हो गया एतबार था ।

एक पैमानें की ख़्वाहिश में ज़ला है दिल मेरा ।
किश्तियाँ भी डूबती रह गयी, मझधार था ।।

ग़ैर के शाये में जाकर मुस्कराने वे लगे ।
हो गये तबसे ज़ुदा वो आख़िरी दीदार था ।।

दिल की धड़कन ले गये वे तोड़कर इस रूह से ।
थी ख़ुसी उस पार जबकि ग़म रुका इस पार था ।।

तिनका तिनका जल गया वह था घरौंदा एक ही ।
आंशुओं के सींचने से जो कभी तैयार था।।

ग़म के अँधियारे मिले है आज तन्हा साहिलों पर ।
डूबने किश्ती लगी पर दर्द बरकरार था ।।

रह गयी थी रश्म "रकमिश" याद की तन्हाइयों में ।
बस निभाता रहा मैं बेरुखा किरदार था।।

                   ©©©

सोमवार, 15 फ़रवरी 2016

ग़ज़ल।ज़ोर ऐ आज़माइस।

ग़ज़ल.....

           आज ले चलते है उन वादियों में , जहा पर बेफ़िक्र निग़ाहों की चहलक़दमी होती है । जहा बन्दगी नही तश्नगी होती है । वो चेहरा जो दीवानगी की ज़न्नत होता है । जो दिल को रौनक करता है । उसी की चाह में बेपरवाह ये दीवाने और उनके तड़पते ख्यायलात उफ़ !!! वो बेकसी । हर तऱफ चाहतें ही चाहते । महफ़िल ही महफ़िल । हर चेहरे पर वफ़ा-ऐ-इश्क़ की झकल में मसगूल मुस्कान ठहरती शाम की वो आबोहवा । उधर अदाओं की नुमाइस तो इधर शराफ़त की पेशकस । उधर मासूमियत का ज़ाम ऐ नज़ाकत तो इधर वफ़ा का हुजूम । फ़िर सुरू होता है दौर ऐ आज़माइस ।
          जी !! मेरे अजीज़ हमसफ़र दोस्तों । तब होता है हिसाब दीवानों की हरक़त का । यक़ीनन इश्क़ बेपरवाह है । बेदाग़ है । मग़र यही मुहब्बत का फ़ितूर है ।दस्तूर है इल्म का । दर व दर ,हमदिल संगदिल की क़ीमत लगती है । हर साँस हर धङकन की क़ीमत लगती है । दिल और सिर्फ़ दिल ही फ़ैसला करता है । और रूह तक काँप जाती है अपने ही दिल की बेबसी पर जब वह किसी ग़ैर की नज़रों और ईशारों की गिरफ़्त में होते है । मेरे दोस्तों ज़ब तड़पता है दिल, कसमसाती है रात ।तब निकलती है इक आह ।तब बनती है एक ग़ज़ल ।।

ज़बाने भर से कहता हूँ कोई गद्दार न निकला ।।
मुहब्बत से करे तौबा कोई क़िरदार न निकला । 

       बाक़ी फ़िर.........

नशा ए इश्क

ग़ज़ल   नशा ए इश्क अब छोड़ा न जाए ।  जमाने से मगर उलझा न जाए ।   बड़ी मासूम हैं उसकी अदाएं,   कि मुझसे और अब देखा न जाए ।   गरीबों ...