ग़ज़ल।दर्द मुझको भी ।
साहिलों पर खो गया तो क्या हुआ ।
बेवफ़ा मैं हो गया तो क्या हुआ ।
अश्क़ में डूबे हुये थे रात दिन ।
जख़्म खुद के धो गया तो क्या हुआ ।
है यक़ीनन वक़्त की बंदिश यहाँ ।
दिल लगा के खो गया तो क्या हुआ ।
ग़म उठा देखा; मिला न कुछ हमे ।
मुस्कराएं है ज़रा तो क्या हुआ ।
जो दिया तन्हाइयो में हौसला ।
दर्द में ग़म बो गया तो क्या हुआ ।
दर्द मुझको भी हुआ होगा कभी ।
आज तुमको हो गया तो क्या हुआ ।
©रकमिश सुल्तानपुरी