,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,ग़ज़ल ,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,
फ़र्ज़ अपना जहां मे निभाने लगा ।
आदमी आज फ़िर मुस्कुराने लगा ।
तोड़कर जाति धर्मों के बंधन सभी ।
प्यार की लौ हृदय मे जलाने लगा ।
खा रहे एक थाली मे निर्धन धनी ।
कोई रूठा तो कोई मनाने लगा ।
पुत्र परिवार का एक सहारा बना ।
मां पिता के बचन वो निभाने लगा ।
हार मे जीत मे फ़ासले न रहे ।
हौसला वो सभी का बढ़ाने लगा ।
आग़ बदले की भड़की थी संसार मे ।
एकजुटता से उसको बुझाने लगा ।
मिल रही है ख़ुसी देख रकमिश तुझे ।
अंधा लूले को राहें दिखाने लगा ।
रकमिश सुल्तानपुरी