शनिवार, 5 अगस्त 2017

ये शहीदों नमन वीरता के लिए ।

       ,,,,,,,,,,,,, ग़ज़ल ,,,,,,,,,,,,,,,,

        त्याग तुमने किया वेदना  के  लिए ।
        ऐ  शहीदों  नमन  वीरता  के  लिए ।

        भारती  माँ  के  बेटे अमर  हो  गए ।
        देश को दे आज़ादी सदा  के  लिए ।

        देश के ताज़ का ही सितारा हो तुम ।
        चमचमाते   रहो  शौर्यता  के  लिए ।

        जीत को जीतकर हार भी जीतकर ।
        ख़ुद  सहारा  बने  हारता  के  लिए ।

        मानकर  देश   हर   धर्मनिरपेक्षता ।
        हाथ फैलायें  है  मित्रता  के   लिए ।

        याद  आती   हमे   तेरी  कुर्बानियां ।
        है  मुझे गर्व उस  दिव्यता  के  लिए ।

        धन्य  है  देश  पा  तेरे  वरदान  को ।
        गीत   गायेंगे  हम  देवता  के  लिए । 

                          @राम केश मिश्र

रविवार, 23 जुलाई 2017

हो गयी कमजोर ताक़त तब मेरे फ़नकार की

            ----------ग़ज़ल----------

      साहिलों पर ढह गयी जब रहनुमाई  प्यार  की ।
      हो गयी कमजोर ताक़त तब मेरे फ़नकार की ।।

      रफ़्ता  रफ़्ता  काफ़िलों मे मै अकेला रह गया ।
      खो गयी  उम्मीद  सारी  आरजू  दरकार  की ।।

      अलविदा कहने को आये पत्थरे दिल हमसफर ।
      गलतियां मेरी गिनाते  बढ़  गये  असफ़ार  की ।।

      इक़तिजा मेरी न  समझे   जिंदगी   जीने  लगे ।
      सुर्खियां बनने  लगी थी  बेवज़ह  इनकार  की ।।

      ख़्वाहिखे उनकी अलग थी मेरी दुनियां से सदा ।
      जुस्तुजू करता कहाँ तक फ़ाकिरी सरकार की ।।

      बेख़ुदी में  आजतक मैं  ले  सका  न  फ़ैसला ।
      दिल हक़ीक़त जानता है दर्द ऐ अशआर  की ।।

      अनकही रकमिश हमारी जिंदगी  की  दास्तां ।
      लोग चर्चा कर  रहे  थे पर  तेरे  किरदार  की ।।

                             @राम केश मिश्र

मंगलवार, 18 जुलाई 2017

सिर्फ मुझको सज़ा आपने क्यो दिया ।

गजल

दर्द दिल का बढ़ा आपने  क्यों  दिया ।
सिर्फ़ मुझको सज़ा आपने क्यों दिया ।।

आप भी हो  गुनेगार  मानो  यकीं ।
मेरी चाहत भुला आपने क्यों दिया ।

आरजू थी तेरी  दोसती  की  बहुत ।
दिल्लगी मे दग़ा आपने क्यों दिया ।।

राह भटका हुआ था  मुसाफ़िर  कोई ।
ग़म का मंज़र दिखा आपने क्यो दिया ।।

लफ़्ज के ज़ख़्म दिल मे समाते गये । 
आंसुओं को जला आपने क्यों दिया ।

मुद्दतो से मिली थी ख़ुसी की झलक ।
मुस्कराकर  रूला आपने क्यों दिया ।।

फ़ाशलो के तऱीके थे रकमिश बहुत ।
मर्ज़ देकर दवा  आपने  क्यो  दिया ।। 

                      राम केश मिश्र

मंगलवार, 11 जुलाई 2017

विश्व मे प्यार की दुनियां बसा ।

         *ग़ज़ल।विश्व मे प्यार की दुनिया बसा ।*

          विश्व मे अब प्यार की  दुनियां  बसा ।
          आज चल तू नेह  का  दीपक  जला ।।

          क्रोध ईर्ष्या लोभ निज अभिमान को ।
          दुर्व्यसन की  भावना  जड़  से  मिटा ।।

          हो  सके तो  बाट  ले  दुख  गैर  का ।
          भूल कर भी दिल किसी का ना दुखा ।।

          जो   मिले  दिव्यांग  सहते   रुग्णता ।।
          मांग  ले  उनके  लिये  रब  से  दुआ ।।

          छोड़   आशा  को  बने जो  आलसी ।
          हौसलों   की  रोशनी  उनको  दिखा ।।

          भावना  पनपा  सदा  ही  शांति  की ।
          विश्व  का  कर  बाद  तेरा  हो  भला ।।

          'राम'  तेरा  जन्म  हो  जाये  सफल ।
          नाम से जादा किसी को क्या मिला ।। 

                           राम केश मिश्र 
                      सुल्तानपुर उत्तर प्रदेश

सोमवार, 10 जुलाई 2017

चाल दुनिया दोगली चलने लगी ।

@ ग़ज़ल।चाल दुनिया दोगली चलने लगी @

       जिंदगी मे अड़चने  बढ़ने  लगी ।
       चाल दुनियां दोगली चलने लगी ।

       लाइलाजे प्यार मे  सौदा  हुआ ।
       इत्तिका में  आबरू लुटने  लगी । 

       हाथ लम्बे है  बहुत  कानून  के ।
       ज़ालिमों की गर्दने  बढ़ने  लगी ।। 

       है दबंगों के लिये ख़ुशियां सभी।
       सादगी  से  ज़िंदगी  डरने  लगी । 

       हुक्मरानों के  लिये  सारा  जहां ।
       जी हुजूरों को सज़ा मिलने  लगी ।

       जाहिलो को मुफ़्त ताजो  तख्तियां ।
       क़ाबिलों को धमकियां खलने लगी ।।

       कर रहे हमआम 'रकमिश,गलतियां।।
       जाबितों की  किस्तियाँ फँसने लगी ।।

                           राम केश मिश्र
                      सुल्तानपुर उत्तर प्रदेश

रविवार, 9 जुलाई 2017

मुहब्बत आपकी देखा नही था ।


बहर- हज़ज मुसद्दस महजूफ़
वज़्न-- 1222 /1222 /122
अर्कान-- मुफ़ाईलुन मुफ़ाईलुन फ़ऊलुन
काफिया- ना
काफ़िया के स्वर- आ
रदीफ़ --- नहीं था
क्वाफी- देखा, चाहा, सोचा, पाया, धोक़ा, सोया, 

मुहब्बत आपकी  देखा  नही था ।
सही है जख़्म भी खाया नही था ।।

इरादे   आपके   बेशक़  सही  थे ।
मुझे ही इश्क़ कुछ आया नही था ।।

उनींदी आज भी  आँखे  हमारी ।
यक़ीनन रात भर सोया नही था ।।

शिकायत है नही दिल को किसी से ।
ज़रूरत थी  कोई  धोख़ा  नही  था ।।

मुझे   मालूम   थी  वो    बेवफ़ाई ।
तभी तो आज तक रोका नही था ।।

बढ़ा दी  ख़ंजरों  की  धार  तुमने ।
सलामत बच सकू मौक़ा नही था ।।

शहादत माँगता है इश्क़ 'रकमिश' ।
यही तो आज तक सोचा नही था ।। 

                  @राम केश मिश्र
                सुल्तानपुर उत्तर प्रदेश


सोमवार, 3 जुलाई 2017

किस्सा सुनाते रह गए सबको ।

बहर-हजज़ मुसम्मन सालिम
अरकान -मफ़ाईलुन मफ़ाईलुन मफ़ाईलुन मफ़ाईलुन
रदीफ़ -रह गए सबको ।
क़ाफ़िया -आते
वज़्न-1222     1222    1222     1222
     ग़ज़ल। किस्सा सुनाते रह गए सबको ।

   कुरेदा जख़्म महफ़िल मे दिखाते रह गए सबको ।
   जफ़ा ऐ इश्क़ का किस्सा सुनाते रह गए सबको ।।

   सकूनत की दवा ख़ातिर महज़ इक आह काफ़ी थी ।
   कोई ढाढ़स नही  देता  बुलाते  रह  गए  सबको ।।

   मिला न एक भी बन्दा मिरा दिल थाम लेने को ।
   उम्रभर आशिकी मे हम मिलाते रह गए सबको ।।

   मुझे ही क्यों मील  लम्हे  भरे  गम  बेहयाई  से ।
   वफ़ा की राह फ़ुर्सत से दिखाते रह गए सबको ।।

   मिली हर बार मुझको ही न जाने बेवफ़ाई  क्यो ।
   दिलों की क़ीमती दौलत लुटाते रह गए सबको ।।

   बड़ी मुद्दत से मिलती है जहाँ में प्यार में ख़ुशियां ।
   बताते रह गए सबको ,  मनाते  रह गए  सबको ।।

   छुपाकर आंख मे आँसू भले रोया था मैं रकमिश ।
   ग़मो के ज़लज़लों मे भी हँसाते रह गए सबको ।। 

                          राम केश मिश्र 

मै तो शायद बदल गया हूं ।

                              गीतिका

मै तो शायद बदल गया हूं
पर तुझमे जज़्बात नही है ।।

और आंधियां ग़म की सहता
इस दिल के हालात नही है ।।

यादों मे तन्हाई ना हो ।
ऐसी कोई रात नही है ।।

अश्को से भीगा रहता हूं
सावन की बरसात नही है ।। 

और दुखो को सह पाऊँ मै ।
अब मेरी औकात नही है ।।  

                              राम केश मिश्र

प्यार की दुनिया बसा ।

         *ग़ज़ल।विश्व मे प्यार की दुनिया बसा ।*

          विश्व मे अब प्यार की  दुनियां  बसा ।
          आज चल तू नेह  का  दीपक  जला ।।

          क्रोध ईर्ष्या लोभ निज अभिमान को ।
          दुर्व्यसन की  भावना  जड़  से  मिटा ।।

          हो  सके तो  बाट  ले  दुख  गैर  का ।
          भूल कर भी दिल किसी का ना दुखा ।।

          जो   मिले  दिव्यांग  सहते   रुग्णता ।।
          मांग  ले  उनके  लिये  रब  से  दुआ ।।

          छोड़   आशा  को  बने जो  आलसी ।
          हौसलों   की  रोशनी  उनको  दिखा ।।

          भावना  पनपा  सदा  ही  शांति  की ।
          विश्व  का  कर  बाद  तेरा  हो  भला ।।

          'राम'  तेरा  जन्म  हो  जाये  सफल ।
          नाम से जादा किसी को क्या मिला ।। 

                           राम केश मिश्र 
                      सुल्तानपुर उत्तर प्रदेश

मंगलवार, 27 जून 2017

इश्क कोई ख़ैरात नही है ।

                              गीतिका
मै तो शायद बदल गया हूं
पर तुझमे जज़्बात नही है ।।

और आंधियां ग़म की सहता
इस दिल के हालात नही है ।।

यादों मे तन्हाई ना हो ।
ऐसी कोई रात नही है ।।

अश्को से भीगा रहता हूं
सावन की बरसात नही है ।। 

और दुखो को सह पाऊँ मै ।
अब मेरी औकात नही है ।।  

                              राम केश मिश्र

नशा ए इश्क

ग़ज़ल   नशा ए इश्क अब छोड़ा न जाए ।  जमाने से मगर उलझा न जाए ।   बड़ी मासूम हैं उसकी अदाएं,   कि मुझसे और अब देखा न जाए ।   गरीबों ...