मंगलवार, 13 जून 2017

गीतिका।मुझको अपना यार समझ ले ।

गीतिका

मुझको ख़ुद का प्यार समझ ले ।
बिन कांटो का हार समझ ले ।। 

टूट गया तो गया काम से ।
इकतारा का तार समझ ले ।

दिल को तेरे परख रहा हूं  ।
चाहे अत्याचार समझ ले ।। 

एहसासों का रूप बनाता ।
भावों का सृंगार समझ ले ।

सन्देहों की जाल बिछाकर ।
डूब रहा मझधार समझ ले ।

डरा हुआ हूं ख़ामोशी से ।
डर को मेरी हार समझ ले ।।

मुस्कानों की एक अदा पर ।
बेशक़ हूं बीमार समझ ले ।। 

रकमिश तेरा हुआ दिवाना ।
चाहे तो बेकार समझ ले ।।

                       
                   रकमिश सुल्तानपुरी


एक नशा प्यार का छा गया है ग़ज़ब

ग़ज़ल।

दिल तुम्हारा मुझे भा गया  है ग़ज़ब ।
इक नशा प्यार का छा गया है ग़ज़ब ।। 

भर खिली आँख मे तेरी तस्वीर है ।
तन शरारा सुकूँ पा गया है ग़ज़ब ।। 

ज़म गया ज़ाम साक़ी पिलाये किसे ।
ग़ल लुटाने को नापा गया है ग़ज़ब ।। 

रुक गयी रूप पर आज है चाँदनी ।
ग़म पुराना कुरेदा गया है  ग़ज़ब  ।। 

लत लगी है तुम्हे देखने की सनम ।
दिल दुआ से दवा पा गया है ग़ज़ब ।।

धड़कने बढ़ गयी है यहां रूह की ।
इत्तिका की हवा पा गया है ग़ज़ब ।।

गुम तुम्हारी अदाओं मे रकमिश हुआ ।
सिलसिला का मज़ा पा गया है ग़ज़ब ।। 

              रकमिश माने -राम केश मिश्र

सोमवार, 12 जून 2017

ग़ज़ल।मन्ज़िले चल पड़ी रास्ता छोड़कर ।

     गजल।मंज़िले चल पड़ी रास्ता छोड़कर ।।

दोस्तों ने सभी फ़ासला छोड़कर ।
दर्द बेशक़ दिया दायरा छोड़कर ।।

इश्क़ भी हाशिये पर रुका रह गया ।
जख़्म रोने लगा आसरा छोड़कर ।। 

शख़्स रोता रहा देखकर साज़िशें ।
वक़्ते दर प्यार का मामला छोड़कर ।। 

एक तूफ़ान दिल मे सुरु क्या हुआ ।
अश्क़ ठहरा रहा ज़लज़ला छोड़कर ।। 

चाहता चाहता चाहता चल पड़ा ।
चाहते मुड़ गयी चाहता छोड़कर ।।

पास आया बड़ी मिन्नतों से मग़र ।
मंज़िले चल पड़ी रास्ता छोड़कर ।।

कौन सुनता भला दर्द रकमिश तेरा ।
मौत भी चल पड़ी दास्ताँ छोड़कर ।।

                            @ राम केश मिश्र

दोस्तों के लिये मैं रुका रह गया ।


       @ ग़ज़ल।दोस्ती के लिये मै रुका रह गया ।@

दोस्ती के लिये मै रुका रह गया ।
अश्क़ आंखों मे मेरे छुपा रह गया ।।

इश्क़ मे बेक़सी की हवा के लिए ।
एक अर्से से पाता सज़ा रह गया ।।

इश्क़ को जुस्तजू रास आयी नही ।
लाख़ चाहा मग़र फ़ासला रह गया ।।

लव्ज़ होठों पर आकर रुके से रहे ।
राज़ दिल का दिलों मे छुपा रह गया ।। 

सबको तौफा मिला दोस्ती का यहाँ ।
दोस्त ख़ामोश दिन देखता रह गया ।। 

साथ जत्था चला काफ़िलों का मिरे ।
पर अकेला यहाँ हर दफ़ा रह गया ।।

सिर्फ़ तन्हा मिला ज़िन्दगी मे मुझे ।
दर्द ही एक रकमिश, दवा रह गया ।। 

                                राम केश मिश्र

फ़ासला बढ़ता रहा ।

  -----------फ़ासला बढ़ता रहा ------------

दोस्तों का ज़िन्दगी भर दाख़िला बढ़ता रहा ।
दास्ताँ सुनकर वफ़ा की हौसला बढ़ता रहा ।। 

फ़ायदे की लाख़ कोशिश मे गवाँ दी जिंदगी ।
उम्रभर बस दर्द का सिलसिला बढ़ता रहा ।। 

हो गये सब ख़ाक अरमां छा गये बनके धुआँ ।
गर्दीशे तूफ़ान का इक ज़लज़ला बढ़ता रहा ।।

मुजरिमों के साथ मुज़रिम आईना बारूद का ।
हमवफ़ा की आरजू रख जो मिला बढ़ता रहा ।।

बावफ़ा की साख़ पर फिर आतिशों के ढ़ेर से ।
ज़ल गयी ज़ागीर दिल की मनचला बढ़ता रहा ।।

आफ़तों से बच नही पायी है दुनियां ये कभी ।
वक़्त दर तारीख़ दर फिर ग़िला बढ़ता रहा ।। 

मिट गये होते जहां के फ़लसफे रकमिश सभी ।
ज़िन्दगी से मौत का बस फ़ासला बढ़ता रहा ।।

                                    राम केश मिश्र

गुरुवार, 8 जून 2017

क्या प्रेम है जहाँ मे करके दिखा दिया ।

            *एक ग़ज़ल की कोशिश*

क्या प्रेम है जहाँ मे करके दिखा दिया ।
होता अमर है कैसे मरके दिखा दिया ।। 

यहाँ लोग जी रहे है इश्क़ की बदौलत ।
राँझा ने उम्रभर आहे भरके दिखा दिया ।।

लैला भी चाहती थी मजनूं को दर्द न हो ।
वो दर्द थी मुहब्बत हरके दिखा दिया ।।

राधा रही दिवानी शर्मोहया को छोड़ा ।
मीरा ने इस जहाँ मे तरके दिखा दिया । 

रोया था हर दिवाना तड़पी थी जिंदगी ।
ख़ूने ज़िगर से आंशू ढरके दिखा दिया ।।

ऐ शौक़ है ख़ुदा की हर चीज़ लाज़िमी है ।
है बेज़ुबान तूफ़ां छल के दिखा दिया ।।

ऐ 'रक,मिली जुदाई साहिलों के माफ़िक़ ।
थे रहनुमां वे इश्क़ पड़के दिखा दिया ।। 

                         @राम केश मिश्र

Ram Kesh Mishra

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मंगलवार, 6 जून 2017

यहाँ पर मुस्कुराने मे।

         ग़ज़ल -यहाँ पर मुस्कुराने मे

तलाशे इश्क़ मे निकला जफ़ा के आशियाने मे ।
बड़ी तकलीफ़ पाया हूं यहाँ पर मुस्कुराने मे ।।

मिली जो मतलबी दुनियां तराशेगी मुहब्बत को ।
मुझे मालूम है लेकिन मज़ा है आजमाने मे ।।

वफ़ा के नाम पर उनको खुदा ही मान बैठा हूं ।
मुझे दिलचस्पी है उनमे उन्हें किस्सा सुनाने मे ।।

हँसेगी देखकर दुनियां जलता घर ग़रीबों का ।
मदद करता नही कोई जरा कर्जा चुकाने मे ।।

न रिस्ते है न रिस्तों की कोई परवाह करता है ।
नही जज़्बात है क़ायम बेक़ाबू इस जमाने मे ।।

हक़ीक़त मे कहर बरपा जवां है गमसुदा आलम ।
कहाँ तकलीफ़ होती है किसी का दिल दुखाने मे ।।

मुहब्बत मे वकीली का मुझे एतराज है रकमिश । 
बहें है आँख से आंसू जरा सा गुनगुनाने में । 

                                     राम केश मिश्र

गुरुवार, 1 जून 2017

मेरे कातिलों को ख़बर कीजिये ।

ग़ज़ल।। मेरे कातिलों को ख़बर कीजिये ।

वक्त काफ़ी है थोड़ा सबर कीजिये ।
मेरे कातिलों को ख़बर कीजिये ।। 

दर्द का शौक़ पाला है हमने यहाँ ।
ग़म उन्हें क्यो उनको निडर कीजिये ।। 

वक़्त रुकता नही है खुदा के लिये ।
वक्त आये तो उनको इधर कीजिये ।।

डूब जायेगे आएगा जब ज़लज़ला ।
तब तलक दर्द को बेअसर कीजिये ।।

कोई सीसा नही टूट जाए जो दिल ।
मौत वालो को कह दो ज़िगर कीजिये ।।

इस मुहब्बत मे वे भी गुनेहगार है  ।
वक्ते दर आज उनको नज़र कीजिये ।।

मंजिले पास आएगी रकमिश' तिरी ।
इश्क़ तन्हा है थोड़ा सफ़र कीजिये ।।  

                      राम केश मिश्र

रविवार, 28 मई 2017

ग़ज़ल। मेरा यार मुझसे ख़फ़ा हो रहा है ।

गजल/मेरा यार मुझसे ख़फ़ा जो रहा है ।
वज़्न- १२२-१२२-१२२-१२२

मेरा जख़्म फ़िर से रवां हो रहा है ।
मेरा यार मुझसे ख़फ़ा हो रहा है ।।

जिसे सब्र की राह मैने दिखाया ।
वही गैर पर अब फ़ना हो रहा है ।।

कभी आँख मे अश्क़ आये नही थे ।
सुरू दर्द का ज़लज़ला हो रहा है ।।

मुहब्बत मे मेरे बना था मसीहा ।
किसी गैर का वो ख़ुदा हो रहा है ।।

तिरा फ़ैसला दर्द देगा यक़ीनन ।
बड़े शौक़ से तू जुदा हो रहा है ।।

वफ़ाई तुम्हें रास आयी नही क्यों  ।
वफ़ा था कभी बावफा हो रहा है ।।

न जा आज रकमिश बड़ी बेख़ुदी है ।
जरा पास हो तो दवा हो।  रहा है ।। 

                               राम केश मिश्र

नशा ए इश्क

ग़ज़ल   नशा ए इश्क अब छोड़ा न जाए ।  जमाने से मगर उलझा न जाए ।   बड़ी मासूम हैं उसकी अदाएं,   कि मुझसे और अब देखा न जाए ।   गरीबों ...