रविवार, 28 मई 2017

ग़ज़ल। मेरा यार मुझसे ख़फ़ा हो रहा है ।

गजल/मेरा यार मुझसे ख़फ़ा जो रहा है ।
वज़्न- १२२-१२२-१२२-१२२

मेरा जख़्म फ़िर से रवां हो रहा है ।
मेरा यार मुझसे ख़फ़ा हो रहा है ।।

जिसे सब्र की राह मैने दिखाया ।
वही गैर पर अब फ़ना हो रहा है ।।

कभी आँख मे अश्क़ आये नही थे ।
सुरू दर्द का ज़लज़ला हो रहा है ।।

मुहब्बत मे मेरे बना था मसीहा ।
किसी गैर का वो ख़ुदा हो रहा है ।।

तिरा फ़ैसला दर्द देगा यक़ीनन ।
बड़े शौक़ से तू जुदा हो रहा है ।।

वफ़ाई तुम्हें रास आयी नही क्यों  ।
वफ़ा था कभी बावफा हो रहा है ।।

न जा आज रकमिश बड़ी बेख़ुदी है ।
जरा पास हो तो दवा हो।  रहा है ।। 

                               राम केश मिश्र

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