ग़ज़ल।परिंदा एक पाला था ।
वफ़ा की शाख़ पर तुमसा परिंदा एक पाला था ।
नया फ़िर जख़्म दे बैठा दरिंदा एक पाला था ।
गया वो लूटकर बेशक़ मज़ा मेरी मुहब्बत का ।
ख़फ़ा दुनियां से होकर के बासिन्दा एक पाला था ।
हिफ़ाजत क्या करेगा वो जिसे ख़ुद की नही चिंता ।
मौत से कम नही निकला कि जिंदा एक पाला था ।
नफ़ासत ही मिली दिल को रही ताउम्र तन्हाई ।
दवा ऐ दर्द मे गम का पुलिंदा एक एक पाला था ।
रवां साहिल से होकर के बहाया आँख से आँसू ।
मिला तालाब पर सूखा कलिंदा एक पाला था ।
दिवाना था, सुहाना था,रूहानी थी कशिश उसकी ।
जुदा दुनियां से था रकमिश चुनिंदा एक पाला था ।।
राम केश मिश्र
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