*भैया जी अखबारों से *
बन जाता है देश महान भैया जी अखबारों से ।
चौराहें पर बढ़ती शान भैया जी अखबारों से ।
वे बच्चे भी बेच रहे है जिनको जाना है स्कूल ।
अंधकार में नया विहान भैया जी अखबारों से ।
राजनीति की चर्चाओं पर बढ़ चढ़ कर लेते है भाग
आ जाती सोहदो मे जान भैया जी अखबारों से ।
कुछ है नयी पुरानी खबरें कुछ तो खुद को दुहराती ।
कुछ दिन भूखा रहा किसान भैया जी अखबारों से ।
छुपे हुये आज घरो में वहसी वही दरिंदे सब ।
मै तो करता हूं ऐलान भैया जी अखबारों से ।
रोज योजना की हेडिंग आती जाती रहती है ।
जनता सहती है अपमान भैया जी अखबारों से ।
खाली होता पॉकेट जिनका फुर्सत नही है पढ़ने की
भर जाती है रोज दुकान भैया जी अखबारों से ।
राम केश मिश्र
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