रविवार, 28 मई 2017

मुझे आज अपनी कहानी सुना दो ।

ग़ज़ल

ग़मों की बेमानी जफ़ाएँ भुला  दो ।
मुझे आज अपनी कहानी बता दो ।।

बहे अश्क़ आँखे  हुई  बेमज़ा  है ।
दिले दरमियाँ आज पर्दा हटा  दो ।।

ख़ुदा के लिये आज कहके हक़ीक़त ।
वफ़ा बेवफ़ा की  मुहब्बत  सुना दो ।।

हुई शाम आयी अँधेरी घड़ी है ।
मिरे साथियां बेक़सी को भुला दो ।।

ज़रा सी कठिन है नयी राह लेकिन ।
करो फ़ैसला जामे उल्फत पिला दो ।।

सुरू तो करोगे नयी ज़िन्दगी फ़िर ।
हमारे  लिये  ही  जरा  मुस्कुरा  दो ।।

तिरे दर्द की है दवा सिर्फ़ रकमिश'।
मिरे सांस से तुम ज़रा गुनगुना दो ।।

                रकमिश=राम केश मिश्र
           

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