ग़ज़ल।खुदा खुद की मुहब्बत का।
रदीफ़ -का
काफ़िया -मुरौव्वत,हक़ीक़त,हुकूमत,कीमत,आदि
मतला-
फ़ना कर उम्रभर देखो तमाशा बेमुरौव्वत का ।
पता फिर भी नही मिलता मुहब्बत में हक़ीक़त का ।
शेर-
लगेगी एक दिन ठोकर भरोसा टूट जायेगा ।
जुनूँ बेदम पड़ा होगा वफ़ाओं पर हुकूमत का ।।
मिलेगा शख़्स हर कोई वफ़ा में दर्द का मारा ।
लेकर फ़िर रहा होगा तमन्ना वो नशीहत का ।
महज़ काफ़ी नही होता दिलों पर हाथ रख देना ।
मिलेगा सब्र कर सब को सही अंजाम नीयत का ।।
करोगें तुम वफ़ा हर दिन मिलेगा एक दिन धोखा ।
न कोई दाम देगा फ़िर तेरे ग़म की वशीयत का ।।
मुक़दमे बेहयाई में गवाही की ज़रूरत क्या ।
निगाहें फ़ैसला करतीं यहाँ दिल क़ी तबीयत का ।
मकता-
भरा शैलाब मिलता है उन्हीं आँखों में अब 'रकमिश"
जिन्हें हम मान बैठे थे खुदा खुद की मुहब्बत का ।।
©राम केश मिश्र(रकमिश)