सोमवार, 13 फ़रवरी 2017

ग़ज़ल।मुहब्बत की दवा लेकर।

ग़ज़ल।।लौटा हूं मुहब्बत की दवा लेकर।।

जफ़ा ग़मगीन महफ़िल से आया हूं मज़ा लेकर ।
गवां दी जिंदगी बेशक मुहब्बत की हवा लेकर ।। 

रहा बेफ़िक्र हरपल मै किस्मत के इरादों से ।
बड़ी मुश्किल से ज़िंदा हूं शराफ़त की सज़ा लेकर ।।

नसीबो से मिले ज़ख़्मो को कैसे मैं भुला देता ।
सँजोये फ़िर रहा हूं मैं गुनाहों की अदा लेकर ।।

हुजूमे बावफ़ा देखा खफ़ा नफ़रत के मारे है ।
बहे है आँख से आंशू शरारत की जुबाँ लेकर ।

तुम्हे मालूम न होगा ग़म-ऐ -मंजर तबाही का ।
वफ़ा का क़त्ल करते है इशारों में नफ़ा लेकर ।।

गया मैं हार कर क़ोशिश रफ़ू दिल पर नही होता ।
कुरेदा तो लहू निकले नफ़ासत में रवां लेकर ।।

चले आओ वफ़ाई से मिलन रकमिश" अधूरा है ।
यकीं मानो मैं लौटा हूं मुहब्बत की दवा लेकर ।। 

                               © राम केश मिश्र

                

रविवार, 12 फ़रवरी 2017

ग़ज़ल।बस बेवफ़ाई प्यार में।


      ग़ज़ल।। बस बेवफ़ाई प्यार में ।

मुश्किलों से मिल यहां पाती रिहाई प्यार में ।
दे रहे सब रहगुज़र मसलन दुहाई प्यार में ।।

जो कभी नाकाम थे मंजिले उनको मिली न ।
आज बेशक़ कर रहे है रहनुमाई प्यार में ।।

ह्मवफ़ा सब हो गये इश्क़ के मारे मुवक्किल । 
जल रहे है आज़कल बन रोशनाई प्यार में ।। 

साहिलों पर आज बर्पी हैं निरा ख़ामोशियां ।
कौन देता अब फिरे दर दर गवाही प्यार में । ।

इश्क़ के झांसो मे फँसकर दाँव पर है जिंदगी ।
मौत से बेहतर भली बेशक़ जुदाई प्यार में ।।

हो गया मुझको यकीं इल्म उनको हो न हो ।।
लम्हा लम्हा ग़मसुदा क़ीमत चुकाई प्यार में ।।

मंजिले उनके नसीबों में लिखी थी मिल गयी ।
या ख़ुदा मुझको मिली बस बेवफ़ाई प्यार में ।।

आरजू है ख़ाख रकमिश गर्दिशे थी उम्रभर ।
जख़्म ख़ाकर ज़िन्दगी मैंने लुटाई प्यार में ।।

                         © राम केश मिश्र

गुरुवार, 9 फ़रवरी 2017

ग़ज़ल।मौत भी अपमान की ।

ग़ज़ल।मौत भी अपमान की ।।

खिल्लियां उड़ने लगी है ऐ खुदा ईमान की ।
जीत अब होने लगी है बेवज़ह बेईमान की  ।।

मुजरिमों के लिये है इज्जतें बेशक़ रिहाई ।
बेगुनाहों को सज़ा ये मौत भी अपमान की ।।

प्यार में नाक़ाम निकला ह्मवफ़ा नादान दिल ।
धौंस जमती बेवफ़ा डर इश्क़ में शैतान की ।।

ख़ुद सबूतों की तवज़्ज़ो दे रहे है लोग सब ।
फ़िक्र ऐ क़ीमत नही है वक़्ते दर एहसान की ।।

जान जोख़िम की बदौलत ही बनेंगे ह्मसफर ।
बदगुमानी में लगा कर झूठी बाजी जान की ।।

थम नही पाता यहाँ क्यों दोस्ती का सिलसिला ।
जब क़दर होती नही दिल आरजू सम्मान की ।। 

साहिलों का ज़लज़ला देख तू ख़ामोश कैसे ।
दर्द के नग़मे है रकमिश गर्दिशे-तूफ़ान की ।।

                          ©®® राम केश मिश्र

रविवार, 5 फ़रवरी 2017

ग़ज़ल मुहब्बत जब नजर आती ।


       ग़ज़ल।। मुहब्बत जब नज़र आती ।।

गवाही बेवज़ह निकली जमानत जब नजर आती ।
वफ़ाई की तमन्ना क्यों मुहब्बत जब नज़र आती ।।

गुरु है वो , खुदा , रहबर , ईश्वर है , मसीहा है ।
मिला सबको यहीनन तू जरूरत जब नजर आती ।। 

न मंदिर में न मस्जिद में न गिरजाघर न गुरुद्वारा ।
दिलों में झांककर देखा वो सूरत जब नजर आती ।। 

न माने वो तो मत माने मग़र है मानना उनको ।
झुके वो शर्म के मारे हुकूमत जब नज़र आती ।। 

रहे हो ख़ोज क्या भटका ,खोया वो ज़बाने में ।
ज़र्रे ज़र्रे में  हाज़िर वो मुहूरत जब नज़र आती ।। 

बनो इंसान तू 'रकमिश' वही रब की इबादत है ।
तभी दीदार ए रब होगा ईमानत जब नज़र आती ।।

                                    ©राम केश मिश्र  

रविवार, 29 जनवरी 2017

ग़ज़ल।मुहब्बत जब नज़र आती ।

      ग़ज़ल।। मुहब्बत जब नज़र आती ।।

गवाही की जरूरत क्या जमानत जब नजर आती ।
वफ़ाई की तमन्ना क्यों मुहब्बत जब नज़र आती ।।

गुरु है वो , खुदा , रहबर , ईश्वर है , मसीहा है ।
मिला सबको यहीनन तू जरूरत जब नजर आती ।। 

न मंदिर में न मस्जिद में न गुरुद्वारा न गिरजाघर ।
दिलों में झांककर देखा वो सूरत जब नजर आती ।। 

न माने वो तो मत माने मग़र है मानना उनको ।
झुके वो शर्म के मारे हुकूमत जब नज़र आती ।। 

रहे हो ख़ोज क्या भटका ,खोया वो ज़बाने में ।
ज़र्रे ज़र्रे में  हाज़िर वो मुहूरत जब नज़र आती ।। 

बनो इंसान तू 'रकमिश' वही रब की इबादत है ।
तभी दीदार ए रब होगा ईमानत जब नज़र आती ।।

                                    ©राम केश मिश्र  

सोमवार, 23 जनवरी 2017

ग़ज़ल।ख्वाहिशे तमाम न थी ।

      ग़ज़ल ।। ख्वाहिशें तमाम न थी ।। 

जिंदगी थी रेत सी बन्दिसे तमाम न थी ।
प्यार के आग़ोश में ख्वाहिशे तमाम न थी ।।

कट गये वो दर्द के लम्हे ज़रा सा घाव दे ।
चुप रहा हर जख़्म पर नुमाइशे तमाम न थी ।।

रह गया ख़ामोश मैं वो दग़ा करते रहे ।
प्यार में कायल मेरी फ़रमाइशें तमाम न थी ।।

था बड़ा नादान दिल उनको समझ बैठा ख़ुदा ।
था यकीं मेरे प्यार में आजमाइसे तमाम न थी ।।

रकमिश तुम्हारी याद के आंसू बड़े अनमोल है ।
पर क्या करे दिल गमसुदा रहाईशे तमाम न थी ।।

                                    राम केश मिश्र

सोमवार, 9 जनवरी 2017

ग़ज़ल ।विंदास है कुहरा ।

            ग़ज़ल।विंदास है कुहरा।

आलम ठंडी का आसपास है कुहरा ।
अपनी इस जवानी में विंदास है कुहरा ।।

कुछ समय के लिये आ जाती निशाँ उतरकर ।
कभी हम पसन्द तो कभी विनास है कुहरा ।।

अलावे जलाकर बैठे लड़के जवान लोग ।
बूढ़े भी कहते अब अनायास  है कुहरा ।।

इक किरण आकर रौशन करती ज़मी को ।
देख सूरज की तपिश ख़लास है कुहरा ।।

गर्मी जब बढ़ी कुहरे की परेसान है सूरज ।
देख लोगो की परेसानी उदास है कुहरा ।।

भला सूरज के सामने कहा तक लड़ता वह ।
हुआ बेबस, लाचार, हतास है कुहरा ।।

रात से है दुश्मनी सुबह तक आता नही ।
समय बदला हो गया निरास है कुहरा ।। 

                            © राम केश मिश्र

ग़ज़ल।मैं भी सितारा था।

             ग़ज़ल।मैं भी सितारा।

मैं भी था सितारों में जगमगाने वालों ।।
थम जाने दो आंशू गीत गाने वालो ।।

अपने लब्ज़ो की बात तो बया कर दू ।
सुना देना तुम भी किस्सा सुनाने वालों ।।

मुश्किलें बहुत हैं अब तो समझ जाओ ।
कब समझोगे मुझको गम में रुलाने वालों ।।

जिन्दा रहा तो जिंदगी बेमौत मार डाली ।
सुन मेरे ज़नाज़े पर यूँ मुस्कराने वालों ।।

मेरी ह्मवफ़ा पर यक़ीन नही है तुमको ।
अपनी बेवफ़ाई पर भी मुस्कराने वालों ।।

अपनी आज़ादी की खुशियां मना लेना तुम ।
आग मद्दिम ही लगाना जिन्दा जलाने वालों ।।

कुछ संगदिल भी देखेगे उस धुँये का जलवा ।
आ गये थे कब्र पर खुसबू चढ़ाने वालों ।।

कब तलक लड़ता मैं वक्त की उस मार से ।
दुश्मनों से मिल गये मुझको जिलाने वालों ।।

जनाजा तो निकल गया इंतक़ामे प्यार में ।
तुम्हारे सिर्फ आँसू ,ऐ आंशू बहाने वालों ।।

बुझेगा नही धुँआ ये आकाश तक जायेगा ।
सितारों में रहूंगा मैं ऐ मुझको मिटाने वालों ।

कही न झुके सर मुहब्बत के शिवा रकमिश ।
देता हूं दुआ कब्र पर सर को झुकाने वालों ।। 

                               राम केश मिश्र

बुधवार, 7 दिसंबर 2016

ग़ज़ल।तेरी वफ़ाई की कहानी भी ।

ग़ज़ल।तेरी वफाई की कहानी भी ।।

जलेगा दिल जलाऊँगा मुहब्बत की निसानी भी ।
लिखूंगा आज मैं तेरी वफाई की कहानी भी ।।

मैं तेरे कमसिनी ख़ंजर के ज़ख़्मो को भुला बैठा ।
तुम्हे तो याद ही होगा मेरे आँखों का पानी भी ।।

मैं शातिर हूं या क़ातिल हूं खुदा हूं या गुनाहों का ।
यक़ीनन पड़ रही मुझको वही कीमत चुकानी भी ।।

सताता था मुझे हर पल तेरी खामोशियो का डर ।
दुनियां हो चुकी तेरी जवानी की दीवानी भी ।।

पलटकर देख़ जाते तो तुम्हारा क्या बिगड़ जाता ।
तड़पकर रो रही होती तेरी यादें रूहानी भी ।।

नज़र ऐ जख़्म था गहरा चुभा नस्तर सा वो सदमा ।
मग़र बेशक मुझे थी वो मुहब्बत आजमानी भी ।। 

रुलाया क्यों मुझे रकमिश सहारा गैर का पाकर ।
ताज़ी हो गयी यादें सदियों की पुरानी भी ।।

                     राम केश मिश्र "रकमिश"

शनिवार, 3 दिसंबर 2016

ग़ज़ल।मुहब्बत वो नही होती ।

       ग़ज़ल। मुहब्बत वो नही होती ।।

वफ़ा में इश्क़ में बंदिश इनायत वो नही होती ।
मिले जो मांगकर चाहत मुहब्बत वो नही होती ।।

किसे परवाह है दिल में झरोखा हो रहा कितना ।
कहे जो आँख के आँसू हक़ीक़त वो नही होती ।।

मिले जो रहनुमां बेशक़ इरादे नेक हो उसके ।
वही मज़बूर कर दे तो हिफ़ाजत वो नही होती है ।।

जरूरी है क़ि ज़ाहिर हो तुम्हारी ह्मवफ़ाई भी ।
दिलों में जख़्म कर जाये शरारत वो नही होती ।। 

वफ़ा में बदसलूकी से नतीज़े लाख़ हो बेहतर ।
गुनाहों में जो साज़िस हो मुरौव्वत वो नही होती ।। 

कफ़न का ख़ौफ़ है जिनको जिहादी वो नही होते । 
मिली जो मौत लालच में शहादत वो नही होती ।। 

लगाकर देख ले रकमिश" तेरा दिल टूट जाएगा ।
मिला चाहत के बदले जो नसीहत वो नही होती ।।

                                राम केश मिश्र

नशा ए इश्क

ग़ज़ल   नशा ए इश्क अब छोड़ा न जाए ।  जमाने से मगर उलझा न जाए ।   बड़ी मासूम हैं उसकी अदाएं,   कि मुझसे और अब देखा न जाए ।   गरीबों ...