रविवार, 5 फ़रवरी 2017

ग़ज़ल मुहब्बत जब नजर आती ।


       ग़ज़ल।। मुहब्बत जब नज़र आती ।।

गवाही बेवज़ह निकली जमानत जब नजर आती ।
वफ़ाई की तमन्ना क्यों मुहब्बत जब नज़र आती ।।

गुरु है वो , खुदा , रहबर , ईश्वर है , मसीहा है ।
मिला सबको यहीनन तू जरूरत जब नजर आती ।। 

न मंदिर में न मस्जिद में न गिरजाघर न गुरुद्वारा ।
दिलों में झांककर देखा वो सूरत जब नजर आती ।। 

न माने वो तो मत माने मग़र है मानना उनको ।
झुके वो शर्म के मारे हुकूमत जब नज़र आती ।। 

रहे हो ख़ोज क्या भटका ,खोया वो ज़बाने में ।
ज़र्रे ज़र्रे में  हाज़िर वो मुहूरत जब नज़र आती ।। 

बनो इंसान तू 'रकमिश' वही रब की इबादत है ।
तभी दीदार ए रब होगा ईमानत जब नज़र आती ।।

                                    ©राम केश मिश्र  

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