सोमवार, 13 फ़रवरी 2017

ग़ज़ल।मुहब्बत की दवा लेकर।

ग़ज़ल।।लौटा हूं मुहब्बत की दवा लेकर।।

जफ़ा ग़मगीन महफ़िल से आया हूं मज़ा लेकर ।
गवां दी जिंदगी बेशक मुहब्बत की हवा लेकर ।। 

रहा बेफ़िक्र हरपल मै किस्मत के इरादों से ।
बड़ी मुश्किल से ज़िंदा हूं शराफ़त की सज़ा लेकर ।।

नसीबो से मिले ज़ख़्मो को कैसे मैं भुला देता ।
सँजोये फ़िर रहा हूं मैं गुनाहों की अदा लेकर ।।

हुजूमे बावफ़ा देखा खफ़ा नफ़रत के मारे है ।
बहे है आँख से आंशू शरारत की जुबाँ लेकर ।

तुम्हे मालूम न होगा ग़म-ऐ -मंजर तबाही का ।
वफ़ा का क़त्ल करते है इशारों में नफ़ा लेकर ।।

गया मैं हार कर क़ोशिश रफ़ू दिल पर नही होता ।
कुरेदा तो लहू निकले नफ़ासत में रवां लेकर ।।

चले आओ वफ़ाई से मिलन रकमिश" अधूरा है ।
यकीं मानो मैं लौटा हूं मुहब्बत की दवा लेकर ।। 

                               © राम केश मिश्र

                

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