गुरुवार, 1 जून 2017

मेरे कातिलों को ख़बर कीजिये ।

ग़ज़ल।। मेरे कातिलों को ख़बर कीजिये ।

वक्त काफ़ी है थोड़ा सबर कीजिये ।
मेरे कातिलों को ख़बर कीजिये ।। 

दर्द का शौक़ पाला है हमने यहाँ ।
ग़म उन्हें क्यो उनको निडर कीजिये ।। 

वक़्त रुकता नही है खुदा के लिये ।
वक्त आये तो उनको इधर कीजिये ।।

डूब जायेगे आएगा जब ज़लज़ला ।
तब तलक दर्द को बेअसर कीजिये ।।

कोई सीसा नही टूट जाए जो दिल ।
मौत वालो को कह दो ज़िगर कीजिये ।।

इस मुहब्बत मे वे भी गुनेहगार है  ।
वक्ते दर आज उनको नज़र कीजिये ।।

मंजिले पास आएगी रकमिश' तिरी ।
इश्क़ तन्हा है थोड़ा सफ़र कीजिये ।।  

                      राम केश मिश्र

रविवार, 28 मई 2017

ग़ज़ल। मेरा यार मुझसे ख़फ़ा हो रहा है ।

गजल/मेरा यार मुझसे ख़फ़ा जो रहा है ।
वज़्न- १२२-१२२-१२२-१२२

मेरा जख़्म फ़िर से रवां हो रहा है ।
मेरा यार मुझसे ख़फ़ा हो रहा है ।।

जिसे सब्र की राह मैने दिखाया ।
वही गैर पर अब फ़ना हो रहा है ।।

कभी आँख मे अश्क़ आये नही थे ।
सुरू दर्द का ज़लज़ला हो रहा है ।।

मुहब्बत मे मेरे बना था मसीहा ।
किसी गैर का वो ख़ुदा हो रहा है ।।

तिरा फ़ैसला दर्द देगा यक़ीनन ।
बड़े शौक़ से तू जुदा हो रहा है ।।

वफ़ाई तुम्हें रास आयी नही क्यों  ।
वफ़ा था कभी बावफा हो रहा है ।।

न जा आज रकमिश बड़ी बेख़ुदी है ।
जरा पास हो तो दवा हो।  रहा है ।। 

                               राम केश मिश्र

बन गया पत्थर ज़माना ।

ग़ज़ल (बह्र रहित)
                   बन गया पत्थर ज़माना ।

दे रहा सबको यहाँ ख़ुशियों का इक घर ज़माना ।
बात जब आयी मिरी तो बन गया पत्थर ज़माना ।।

मैं निखालिश प्यार पर कर भरोसा चल रहा था ।
हँस रहा दिल पर मेरे  जख़्म को देकर ज़माना ।।

टूट तो वैसे गया हूं दर्द -ऐ -दिल हालात  से मैं ।
अब चुभोता जा रहा क्यो बेवज़ह नस्तर ज़माना ।।

अश्क़ आंखों मे  नही फ़िर भी कुरेदे जा रहा हूं ।
शक़ उसे है आज़माता जख़्म पर खंज़र ज़माना ।। 

लड़ रहा तन्हाइयों से इश्क़ का मारा मुअक्किल ।
हो गया ख़ामोश मसलन  देखता मंजर ज़माना ।।

कर रहा बेशक़ गुज़ारिश रूह मेरी बख़्स दे अब ।
जबकि पीछे पड़ गया है हाथ ही धोकर ज़माना ।।

मन्नतें माँगी थी रकमिश' उम्र भर बस प्यार की ।
कर दिया बदनाम घायल इश्क़ को लेकर ज़माना । 

                                ©राम केश मिश्र

ग़ज़ल । मुझे हर शख्स प्यारा है ।


             ग़ज़ल। मुझे हर शक़्स प्यारा है ।।
मापनी-1222 1222 1222 1222

किसे मांगू ख़ुदा से मैं यहाँ हर शक़्स मेरा है ।
जिसे मै रहनुमा समझा वही दिल का लुटेरा है ।।

मिला जो अज़नबी मुझको दिलों का घर दिखा बैठा ।
मेरे दिल मे जरा झाँको लुटेरों का बसेरा है ।।

गये वो भूल तन्हा दिल उन्हे खुशियां मिली बेसक ।
मेरे आग़ोश मे फ़ैला जफ़ा- ऐ- ग़म का घेरा है ।।

दिखायी प्यार की राहें जलाकर रौशनी दिल की ।
उन्हें मंजिल मिली अबतक मेरे घर पर अंधेरा है ।।

कहाँ तक ढूढ़ कर लाता दिलों के लाख़ टुकड़ों को ।
रहा जो हौसला बाक़ी ग़मों मे ही बिखेरा है ।। 

ज़रा नज़दीक आ देखों खुदे है फ़लसफ़े तेरे ।
तुम्हारे ज़ख्म इस दिल पर अब तक जो उकेरा है ।।

वफ़ाई लाख़ तू कर ले मिलेगा ख़ाक ही रकमिश, ।
ख़ुदा का है खुदा लेगा न मेरा है न तेरा  है ।।

                              राम केश मिश्र

मुझे आज अपनी कहानी सुना दो ।

ग़ज़ल

ग़मों की बेमानी जफ़ाएँ भुला  दो ।
मुझे आज अपनी कहानी बता दो ।।

बहे अश्क़ आँखे  हुई  बेमज़ा  है ।
दिले दरमियाँ आज पर्दा हटा  दो ।।

ख़ुदा के लिये आज कहके हक़ीक़त ।
वफ़ा बेवफ़ा की  मुहब्बत  सुना दो ।।

हुई शाम आयी अँधेरी घड़ी है ।
मिरे साथियां बेक़सी को भुला दो ।।

ज़रा सी कठिन है नयी राह लेकिन ।
करो फ़ैसला जामे उल्फत पिला दो ।।

सुरू तो करोगे नयी ज़िन्दगी फ़िर ।
हमारे  लिये  ही  जरा  मुस्कुरा  दो ।।

तिरे दर्द की है दवा सिर्फ़ रकमिश'।
मिरे सांस से तुम ज़रा गुनगुना दो ।।

                रकमिश=राम केश मिश्र
           

गुरुवार, 25 मई 2017

हो गये अपने पराये लोग सब ।

ग़ज़ल । हो गये अपने पराये लोग सब ।

हो गये अपने पराये लोग सब ।
बेबसी मे है भुलाये लोग सब ।।

प्यार मे दिल को बिछाना था उन्हें ।
दर्द मे जबकि न आये लोग सब ।।

जीत मे खुशियों के बादल छा गये ।
हार मे  नजरें चुराए लोग सब ।।

जख़्म मे मरहम लगाना था जिन्हें ।
बेरहम बन दिल दुखाये लोग सब ।।

वक्त की थी बन्दिशें मेरे लिये ।
वक्ते दर कहके न आये लोग सब ।।

अश्क़ के दरिया मे डूबा मै रहा ।
झूठ के आँसू बहाये लोग सब ।।

तोड़ के रश्में वफ़ा रकमिश, यहाँ ।
बेवज़ह वादे निभाये लोग सब ।।

                             राम केश मिश्र

शनिवार, 6 मई 2017

भैया जीअखबारों से ।

                 *भैया जी अखबारों से *

बन जाता है देश महान भैया जी अखबारों से ।
चौराहें पर बढ़ती शान भैया जी अखबारों से । 

वे बच्चे भी बेच रहे है जिनको जाना है स्कूल ।
अंधकार में नया विहान भैया जी अखबारों से ।

राजनीति की चर्चाओं पर बढ़ चढ़ कर लेते है भाग
आ जाती सोहदो मे जान भैया जी अखबारों से ।

कुछ है नयी पुरानी खबरें कुछ तो खुद को दुहराती ।
कुछ दिन भूखा रहा किसान भैया जी अखबारों से ।

छुपे हुये आज घरो में  वहसी वही दरिंदे सब ।
मै तो करता हूं ऐलान भैया जी अखबारों से ।

रोज योजना की हेडिंग आती जाती रहती है ।
जनता सहती है अपमान भैया जी अखबारों से ।  

खाली होता पॉकेट जिनका फुर्सत नही है पढ़ने की
भर जाती है रोज दुकान भैया जी अखबारों  से । 

                                       राम केश मिश्र

शुक्रवार, 5 मई 2017

ग़ज़ल।परिंदा एक पाला था ।

ग़ज़ल।परिंदा एक पाला था ।

वफ़ा की शाख़ पर तुमसा परिंदा एक पाला था ।
नया फ़िर जख़्म दे बैठा दरिंदा एक पाला था । 

गया वो लूटकर बेशक़ मज़ा मेरी मुहब्बत का ।
ख़फ़ा दुनियां से होकर के बासिन्दा एक पाला था ।

हिफ़ाजत क्या करेगा वो जिसे ख़ुद की नही चिंता ।
मौत से कम नही निकला कि जिंदा एक पाला था ।

नफ़ासत ही मिली दिल को रही ताउम्र तन्हाई ।
दवा ऐ दर्द मे गम का पुलिंदा एक एक पाला था ।

रवां साहिल से होकर के बहाया आँख से आँसू ।
मिला तालाब पर सूखा कलिंदा एक पाला था ।

दिवाना था, सुहाना था,रूहानी थी कशिश उसकी ।
जुदा दुनियां से था रकमिश चुनिंदा एक पाला था ।। 

                       राम केश मिश्र

बुधवार, 19 अप्रैल 2017

कहानी लिखेंगे ।

            ग़ज़ल।कहानी लिखेंगे ।

चलो आज कुछ तो तुफानी लिखेगे ।
दिलों की मुकम्मल कहानी  लिखेंगें ।  

वही दर्द -ए -ग़म  वही  मुस्कराना ।
जफ़ा कम नफ़ासत पुरानी लिखेगे ।

भुलाते  गये  जो  बने  बेजुबा थे  ।
मिले याद मे  बन  रूहानी  लिखेगे । 

बड़ी कोशिशों से मिला एक मौका ।
ढरे  आँख  से  बूंद  पानी  लिखेगे ।

पढ़े ये  ज़माना  सुने  ये  फिजायें ।
वफा बावफ़ा तक ज़ुबानी लिखेंगे ।

मिला इश्क़ मे हौसला है सभी को ।
लुटी  प्यार मे ए जवानी लिखेंगे । ।

                               ©राम केश मिश्र

बुधवार, 22 मार्च 2017

ग़ज़ल।अब तो हर तरफ तन्हाइयां नजर आती है ।

अब तो हर तरफ तन्हाइयां नजर आती हैं ।।
हर चाहत मे ,दिल मे रूस्वाइयां नजर आती हैं ।।1।।

मुर्झा गयी हर रौनक सूखे पत्तो की तरह ।।
हर रौनक मे भी परछाइयां  नजर आती हैं ।।2।।

मददिम हो गयी उनकी बेसव्रिया जब से ।।
तब से उनकी हरकतो मे बेहयाइया नज़र आती हैं।।3।।

फासले तो मिट गये पर शिकवा नही ।।
नजदीकियो मे भी जुदाइया नजर आती हैं ।।4।।

एहसास होता हैं उन्हें भी मेरे न होने का ।।
और जब होता हू तो अगड़ाइयां नज़र आती हैं ।।5।।

हर कोई बेखौफ हैं प्यार मे यहां पर ।।
फिर भी क्यों दिलो में सिसकारियां नजर आती हैं ।।6।।

हर शख्स का चेहरा हैं उतरा उतरा यहां ।।
हर किसी के दिल मे खामियां नज़र आती हैं ।।7।।।

हर रोज उनकी चाहत पर उठता हैं सवाल ।।
हर दिन उनकी अदा में नादानियाँ नज़र आती हैं ।।8।।

बड़ी उम्मीद थी उनसे प्यार निभ पाने की ।।
अब तो दोस्ती मे भी परेशानियां नज़र आती हैं ।।9।।

और कुछ भी नहीं हैं उनके दिल लगाने मे ।।
अब तो उनके आहट मे भी बदनामियाँ नज़र आती हैं ।।10।।

   --------Ram Kesh Miahra
।।

नशा ए इश्क

ग़ज़ल   नशा ए इश्क अब छोड़ा न जाए ।  जमाने से मगर उलझा न जाए ।   बड़ी मासूम हैं उसकी अदाएं,   कि मुझसे और अब देखा न जाए ।   गरीबों ...