रविवार, 17 जनवरी 2016

ग़ज़ल।मौत तक आती नही।

    ग़ज़ल।मौत मिल पाती नही।

आजकल तन्हा है साहिल नींद तक आती नही ।
अब बेबसी बेहाल रौनक रूह तड़पाती नही ।

तोड़कर दिल जख्म पर मरहम लगाना याद है ।
भूलता कैसे भला मैं बुझदिली आती नही ।।

एक पल क्या मुस्कराया उम्रभर रोना पड़ेगा ।
प्यार की बेमानियो पर हमदिली आती नही ।

बेवफ़ाई की सज़ा का हक मुझे मिल ही गया पर ।
दर्द इतना बढ़ गया कि याद तक आती नही ।

कौन सा बदला मुक़र्रर प्यार में तेरे करू मैं ।
मौत के बदले यहाँ पर मौत मिल पाती नही । 

जा' चला जा दोस्त "रकमिश"बद्दुआ तुमको लगे न । 
अब दुआयें दोस्तों की दिल तलक आती नही ।

           gajalsahil.blogspot.com
                   रकमिश सुल्तानपुरी  

शुक्रवार, 15 जनवरी 2016

ग़ज़ल।मिला इंसान का दर्ज़ा।

      ग़ज़ल।मिला इंसान का दर्जा।

गज़ब का रूप पाये हो मिला इंसान का दर्जा ।
करो दिल से इबादत तुम खुदा ,भगवान का दर्जा । 

ये मत सोचो कि क्या पाया, खोया क्या ज़बाने में ।।
जरा सोचों मिलेगा कब तुम्हे सम्मान का दर्जा ।।

यहा पर दोस्त दुशमन का किसी को फर्क न मालूम ।
वफ़ा कितना करो फिर भी मिले हैवान का दर्जा ।।

मिले जो अज़नबी तुमको उसे भी हमसफ़र समझो ।
अदब से पेश आकर दो उसे पहचान का दर्जा । 

ये रंगत ,मतलबी दुनिया, ये चाहत, दर्द ये खुशिया । 
मिलेगा न दुबारा फिर तुम्हे नादान का दर्जा ।। 

तभी कहता हूँ "रकमिश" मैं  चले साहिल पे तुम आओ ।
मिलेगा हर बखत तुमको यहां मेहमान का दर्जा ।। 

                     ©रकमिश सुल्तानपुरी

मंगलवार, 12 जनवरी 2016

ग़ज़ल । इशारे दर्द के उभरे।

      ।।ग़ज़ल।इशारे दर्द के उभरे।।

कभी जब चाँद देखा तो सितारे दर्द के उभरे ।
तुम्हारे रूप से पहले नजारे दर्द के उभरे ।।

नज़र की क्या खता माने अग़र आँखों में पानी हो ।
पलक झपके कि न झपक़े किनारे दर्द के उभरे ।।

किसी से क्या कहूँ दिल की कोई सुनकर करेगा क्या ।
सितम दिल पर ही होना है सहारे दर्द के उभरे ।। 

ये तन्हा शख़्स भी तो था कोई मासूम सा चेहरा ।
वो लज्जत ,गम भरे लम्हे तुम्हारे दर्द के उभरे ।।

न साहिल है, न मंजिल है, न मंजिल की कोई चाहत ।
न क़ाबिल रह गया दिल का बेचारे दर्द के उभरे ।।

यहा "रकमिश" निगाहों से ज़िगर तक चीर देते है ।
मिले अब तक हमे जो भी इशारे दर्द के उभरे ।। 

                    ©रकमिश सुल्तानपुरी

गुरुवार, 24 दिसंबर 2015

ग़ज़ल।हमआम का डर है।


     ग़ज़ल।यहा हमआम का डर है।

तुम्हारे दर्द तन्हा ग़म ख़फ़ा बदनाम का डर है ।।
मिलेगा प्यार के बदले जफ़ा अंजाम का डर है ।

अभी मासूम हो काफ़ी हिदायत पर नही दूँगा ।
मसलन फ़र्ज़ समझो या कोई पैगाम का डर है ।।

चली जा सोचकर आना न आना तो ही अच्छा है ।
मुहब्बत करके देखा मैं हुआ नाक़ाम का डर है ।

भरोसा क्या करूँ तुम पर भरोसा तोड़ ही दोगे ।
यक़ीनन तुम लगा दोगे दिले इल्जाम का डर है ।।

नजर ही गाड़ देगे सब जरा कर दी सरारत तो ।
मुहब्ब्त है तो होगी ही सुबह से शाम का डर है ।।

करू मैं लाख़ कोशिस तब दुनिया ये न मानेगी ।
जहर सा पी न पाउँगा सजे उस जाम का डर है।।

साहिल पर न आ "रकमिश" यहा रिश्ते बिखरते है । 
वहा गैरो से डर तुमको यहा हमआम का डर है ।।

                       @रकमिश सुल्तानपुरी

शनिवार, 12 दिसंबर 2015

ग़ज़ल।मनाने कौन आता है।

ग़ज़ल।मनाने कौन आताहै ।।

अग़र रूठो मुहब्बत में मनाने कौन आता है ।।
किया वादा इबादत का निभाने कौन आता है ।।

लिए इक ख़्वाब आते कि मिलेगी मंजिले सबको ।।
यहा साहिल पे दुनिया खुद लुटाने कौन आता है ।। 

जरा सी भूल के बदले यक़ीनन तोड़ देगे दिल ।
सहेगे दर्द पर  तन्हा बिताने कौन आता है ।।

करोगे लाख़ कोशिस पर यहा दिल टूट जायेगा ।
मिलेगे जख़्म पर मरहम लगाने कौन आता है ।। 

यहा के मुंशिफी मुखविर मुअक्किल हमसफ़र सारे।। 
लगे है दर्द सब पाने  दिवाने कौन आता है ।। 

भरोसा छोड़ दे 'रकमिश' मिलेगी बेवफाई ही ।।
वफ़ा का कर्ज दुनिया में चुकाने कौन आता है ।।

               ---@रकमिश

शुक्रवार, 11 दिसंबर 2015

ग़ज़ल।उन्हें साहिल नही मिलता।

   ग़ज़ल।उन्हें साहिल नही मिलता।

इलाही छोड़ के नफ़रत दिलों से दिल नही मिलता ।
भरी इस भीड़ के दरम्यां कोई हमदिल नही मिलता ।

जहा देखा मिली हमको निगाहें दर्द में बेबस ।
भटकते दर व् दर बेघर उन्हें महफ़िल नही मिलता ।

गमे हालात बरपी है मुक़द्दर बेवफा निकला ।
उम्रभर प्यार करते पर कोई हासिल नही मिलता ।

इरादे इश्क़ में मशलन बने है वक्त के चश्के ।
वादे टूटते हर पल ग़मे बोझिल नही मिलता ।

यक़ीनन प्यार की मजलिश में डूबे लोग क़ायल है ।
भरे है लोग बेशक़ पर कोई क़ाबिल नही मिलता ।

सहोगे कब तलक 'रकमिश' उनके प्यार के सदमे ।
तुम्हें मंजिल नही मिलती उन्हेँ साहिल नही मिलता ।। 

                                @रकमिश

बुधवार, 9 दिसंबर 2015

ग़ज़ल।हुआ बदनाम 'रकमिश' है।

    ग़ज़ल।हुआ बदनाम रकमिश है ।

अदाओं की कशिश महफ़िल गवाहों की नवाज़िश है ।
तुम्हारे प्यार का मौका कोई गुमनाम साज़िश है ।।

मुझे मन्ज़ूर है फिर भी निभाकर रश्म जाऊँगा ।
लुटा दी जिंदगी हमने तुम्हारी एक कोशिस है ।।

यहा हमदम,यहा रहबर,यहाँ संगदिल दिवाने सब ।
लगे दिल को लगाने सब हुये बेदाम बंदिश है ।।

हुआ है हाल दिल का क्या अगर पूंछो तो मत पूछो ।
तुम्हारे इश्क़ से नफ़रत ख़ुदी के दिल से रंजिश है ।।

तुम्हारे दर पे आया हूँ मलाल-ऐ-इश्क से बोझिल ।
बताने भर कि दुनिया में हज़ारों दर पे नरगिस हैं ।।

गुरूं मतकर, ज़फ़ा मतकर, इबादत हुश्न की कर ले ।
तवज्जो सीख़ साहिल पर हुआ बदनाम "रकमिश" है ।।

                        @राम केश मिश्र

मंगलवार, 8 दिसंबर 2015

ग़ज़ल।यहा इज्ज़त नही मिलती।

   ग़ज़ल।यहा इज्जत नही मिलती।

मुहब्बत में गुनाहों से जिन्हें मोहलत नही मिलती ।
खुदाई है खुदा की पर कभी रहमत नही मिलती ।

छिपी मासूम चेहरों पर गुनाहों की कहानी है ।
अदाओं की नुमाइस से इन्हें फ़ुरसत नही मिलती ।

यक़ीनन ढह ही जायेगी हमारे ख़वाब की मंजिल ।
मुझे मालूम है फिर भी तनिक राहत नही मिलती ।

सहेगे और भी सदमे तुम्हारी चाह में बेबस ।
चला मैं दूर जाऊँगा यहा नफ़रत नही मिलती ।

पलटकर देखने की तुम करोगे लाख़ कोशिस पर ।
हुई बेज़ार नजरो से कभी जन्नत नही मिलती ।

बहुत नाज़ुक तज़ुर्बे है तुम्हारे प्यार के 'रकमिश' ।
शहर से जा रहा तेरे यहा इज्ज़त नही मिलती ।

                       @राम केश मिश्र

रविवार, 6 दिसंबर 2015

ग़ज़ल।दवा पाने नही निकला।

   ग़ज़ल।दवा पाने नही निकला ।

तनिक आया हूँ गर्दिश में हवा खाने नही निकला ।
मुझे हर दर्द मालुम है दवा पाने नही निकला ।।।

पुराने हो गये मसले मग़र हर जख़्म ताज़ा है ।
ग़मो का लुफ़्त लेता हूँ वफ़ा पाने नही निकला ।।

बड़े दिन बाद पाया हूँ दिवानों की कोई महफ़िल ।
दिवानापन उमड़ आया ज़फ़ा गाने नही निकला ।। 

नजऱ का तेज़ खंज़र वो छुपा है आज तक दिल में ।
तड़पता ऱोज दिल है पर ख़ुदा पाने नही निकला ।।

मुज़रिम हूँ  दिवाना हूँ बेगाना हूँ आवारा हूँ ।।
मारा हूँ मुक़द्दर का सजा पाने नही निकला ।। 

चला आया हूँ 'रकमिश' मैं लुटाकर प्यार की दौलत ।
मुझे है दर्द की ख़्वाहिश नफ़ा पाने नही निकला ।। 

                        @राम केश मिश्र

शनिवार, 5 दिसंबर 2015

शेर।किस्से दर्द के अक्सर।

    ।।शेर।। किस्से दर्द के अक्सर।

करूँ किससे शिकायत मैं तुम्हारे प्यार की संगदिल ।
साहिल से समन्दर तक तुम्हारी ही तो चर्चा है ।।

डूबकर देखा हूँ एहसासों की तपिस के शाये में ।
खुद की चाहतो की कही भी मंजिल नही पाया ।

यहा के लोग है कातिल सजा ऐ मौत से पहले ।।
हजारो बार मरते है मुहब्बत में मुअक्किल अब ।।

मुहब्बत से जो बच निकले उन्हें नफरत ने मारा है ।
भरी महफ़िल में अब भी वो तन्हा है अकेले है ।।

वहा भी सब्र न मिलता यादों की रवानी से ।।
किस्से दर्द के अक्सर दिनोदिन याद रहते है ।।

                         @राम केश मिश्र

नशा ए इश्क

ग़ज़ल   नशा ए इश्क अब छोड़ा न जाए ।  जमाने से मगर उलझा न जाए ।   बड़ी मासूम हैं उसकी अदाएं,   कि मुझसे और अब देखा न जाए ।   गरीबों ...