गुरुवार, 24 दिसंबर 2015

ग़ज़ल।हमआम का डर है।


     ग़ज़ल।यहा हमआम का डर है।

तुम्हारे दर्द तन्हा ग़म ख़फ़ा बदनाम का डर है ।।
मिलेगा प्यार के बदले जफ़ा अंजाम का डर है ।

अभी मासूम हो काफ़ी हिदायत पर नही दूँगा ।
मसलन फ़र्ज़ समझो या कोई पैगाम का डर है ।।

चली जा सोचकर आना न आना तो ही अच्छा है ।
मुहब्बत करके देखा मैं हुआ नाक़ाम का डर है ।

भरोसा क्या करूँ तुम पर भरोसा तोड़ ही दोगे ।
यक़ीनन तुम लगा दोगे दिले इल्जाम का डर है ।।

नजर ही गाड़ देगे सब जरा कर दी सरारत तो ।
मुहब्ब्त है तो होगी ही सुबह से शाम का डर है ।।

करू मैं लाख़ कोशिस तब दुनिया ये न मानेगी ।
जहर सा पी न पाउँगा सजे उस जाम का डर है।।

साहिल पर न आ "रकमिश" यहा रिश्ते बिखरते है । 
वहा गैरो से डर तुमको यहा हमआम का डर है ।।

                       @रकमिश सुल्तानपुरी

शनिवार, 12 दिसंबर 2015

ग़ज़ल।मनाने कौन आता है।

ग़ज़ल।मनाने कौन आताहै ।।

अग़र रूठो मुहब्बत में मनाने कौन आता है ।।
किया वादा इबादत का निभाने कौन आता है ।।

लिए इक ख़्वाब आते कि मिलेगी मंजिले सबको ।।
यहा साहिल पे दुनिया खुद लुटाने कौन आता है ।। 

जरा सी भूल के बदले यक़ीनन तोड़ देगे दिल ।
सहेगे दर्द पर  तन्हा बिताने कौन आता है ।।

करोगे लाख़ कोशिस पर यहा दिल टूट जायेगा ।
मिलेगे जख़्म पर मरहम लगाने कौन आता है ।। 

यहा के मुंशिफी मुखविर मुअक्किल हमसफ़र सारे।। 
लगे है दर्द सब पाने  दिवाने कौन आता है ।। 

भरोसा छोड़ दे 'रकमिश' मिलेगी बेवफाई ही ।।
वफ़ा का कर्ज दुनिया में चुकाने कौन आता है ।।

               ---@रकमिश

शुक्रवार, 11 दिसंबर 2015

ग़ज़ल।उन्हें साहिल नही मिलता।

   ग़ज़ल।उन्हें साहिल नही मिलता।

इलाही छोड़ के नफ़रत दिलों से दिल नही मिलता ।
भरी इस भीड़ के दरम्यां कोई हमदिल नही मिलता ।

जहा देखा मिली हमको निगाहें दर्द में बेबस ।
भटकते दर व् दर बेघर उन्हें महफ़िल नही मिलता ।

गमे हालात बरपी है मुक़द्दर बेवफा निकला ।
उम्रभर प्यार करते पर कोई हासिल नही मिलता ।

इरादे इश्क़ में मशलन बने है वक्त के चश्के ।
वादे टूटते हर पल ग़मे बोझिल नही मिलता ।

यक़ीनन प्यार की मजलिश में डूबे लोग क़ायल है ।
भरे है लोग बेशक़ पर कोई क़ाबिल नही मिलता ।

सहोगे कब तलक 'रकमिश' उनके प्यार के सदमे ।
तुम्हें मंजिल नही मिलती उन्हेँ साहिल नही मिलता ।। 

                                @रकमिश

बुधवार, 9 दिसंबर 2015

ग़ज़ल।हुआ बदनाम 'रकमिश' है।

    ग़ज़ल।हुआ बदनाम रकमिश है ।

अदाओं की कशिश महफ़िल गवाहों की नवाज़िश है ।
तुम्हारे प्यार का मौका कोई गुमनाम साज़िश है ।।

मुझे मन्ज़ूर है फिर भी निभाकर रश्म जाऊँगा ।
लुटा दी जिंदगी हमने तुम्हारी एक कोशिस है ।।

यहा हमदम,यहा रहबर,यहाँ संगदिल दिवाने सब ।
लगे दिल को लगाने सब हुये बेदाम बंदिश है ।।

हुआ है हाल दिल का क्या अगर पूंछो तो मत पूछो ।
तुम्हारे इश्क़ से नफ़रत ख़ुदी के दिल से रंजिश है ।।

तुम्हारे दर पे आया हूँ मलाल-ऐ-इश्क से बोझिल ।
बताने भर कि दुनिया में हज़ारों दर पे नरगिस हैं ।।

गुरूं मतकर, ज़फ़ा मतकर, इबादत हुश्न की कर ले ।
तवज्जो सीख़ साहिल पर हुआ बदनाम "रकमिश" है ।।

                        @राम केश मिश्र

मंगलवार, 8 दिसंबर 2015

ग़ज़ल।यहा इज्ज़त नही मिलती।

   ग़ज़ल।यहा इज्जत नही मिलती।

मुहब्बत में गुनाहों से जिन्हें मोहलत नही मिलती ।
खुदाई है खुदा की पर कभी रहमत नही मिलती ।

छिपी मासूम चेहरों पर गुनाहों की कहानी है ।
अदाओं की नुमाइस से इन्हें फ़ुरसत नही मिलती ।

यक़ीनन ढह ही जायेगी हमारे ख़वाब की मंजिल ।
मुझे मालूम है फिर भी तनिक राहत नही मिलती ।

सहेगे और भी सदमे तुम्हारी चाह में बेबस ।
चला मैं दूर जाऊँगा यहा नफ़रत नही मिलती ।

पलटकर देखने की तुम करोगे लाख़ कोशिस पर ।
हुई बेज़ार नजरो से कभी जन्नत नही मिलती ।

बहुत नाज़ुक तज़ुर्बे है तुम्हारे प्यार के 'रकमिश' ।
शहर से जा रहा तेरे यहा इज्ज़त नही मिलती ।

                       @राम केश मिश्र

रविवार, 6 दिसंबर 2015

ग़ज़ल।दवा पाने नही निकला।

   ग़ज़ल।दवा पाने नही निकला ।

तनिक आया हूँ गर्दिश में हवा खाने नही निकला ।
मुझे हर दर्द मालुम है दवा पाने नही निकला ।।।

पुराने हो गये मसले मग़र हर जख़्म ताज़ा है ।
ग़मो का लुफ़्त लेता हूँ वफ़ा पाने नही निकला ।।

बड़े दिन बाद पाया हूँ दिवानों की कोई महफ़िल ।
दिवानापन उमड़ आया ज़फ़ा गाने नही निकला ।। 

नजऱ का तेज़ खंज़र वो छुपा है आज तक दिल में ।
तड़पता ऱोज दिल है पर ख़ुदा पाने नही निकला ।।

मुज़रिम हूँ  दिवाना हूँ बेगाना हूँ आवारा हूँ ।।
मारा हूँ मुक़द्दर का सजा पाने नही निकला ।। 

चला आया हूँ 'रकमिश' मैं लुटाकर प्यार की दौलत ।
मुझे है दर्द की ख़्वाहिश नफ़ा पाने नही निकला ।। 

                        @राम केश मिश्र

शनिवार, 5 दिसंबर 2015

शेर।किस्से दर्द के अक्सर।

    ।।शेर।। किस्से दर्द के अक्सर।

करूँ किससे शिकायत मैं तुम्हारे प्यार की संगदिल ।
साहिल से समन्दर तक तुम्हारी ही तो चर्चा है ।।

डूबकर देखा हूँ एहसासों की तपिस के शाये में ।
खुद की चाहतो की कही भी मंजिल नही पाया ।

यहा के लोग है कातिल सजा ऐ मौत से पहले ।।
हजारो बार मरते है मुहब्बत में मुअक्किल अब ।।

मुहब्बत से जो बच निकले उन्हें नफरत ने मारा है ।
भरी महफ़िल में अब भी वो तन्हा है अकेले है ।।

वहा भी सब्र न मिलता यादों की रवानी से ।।
किस्से दर्द के अक्सर दिनोदिन याद रहते है ।।

                         @राम केश मिश्र

बुधवार, 2 दिसंबर 2015

ग़ज़ल।यही दस्तूर होता है ।

     ग़ज़ल। यही दस्तूर होता है ।

जिसे चाहो मुहब्बत में वही मजबूर होता है ।
रहे तन्हा,उदासी ,गम बड़ा मशगूल होता है ।।

मिलेगीं एक पल खुशियां नजर भर अश्क़ आयेंगे ।
उम्रभर फासले मिटते मग़र वह दूर होता है ।।

बनेंगे रोज़ यादों के झरोंखे चाँद में चेहरा  ।
यही सच है मुहब्बत का यही दस्तूर होता है ।।

ख़ुशी के एक लम्हे जो हमे जीना सिखाएंगे ।
बनेगे जिंदगी के गम ज़रा भरपूर होता है ।।

ख्वाबो की जमी पर ही आहे ऱोज उभरेंगी ।
मिले जो ख़ुशनुमा साहिल असल में दूर होता है ।।

मंजिलें पास ही होंगी मिलेंगे रास्ते खुद से ।
जिंदगी कट भी जाये पर नही मंजूर होता है ।।

मिलेंगी दर्द की मजलिश बेशक गम के मंजर भी ।
यकीनन जख्म हो ताज़ा गमे नासूर होता है ।।

करो तुम कूँच साहिल से "रकमिश"बेवफा दुनिया ।
यहा नादान दिल वाले नशेमन चूर होता है ।।

                            @राम केश मिश्र

बुधवार, 25 नवंबर 2015

ग़ज़ल । दिल दुखाया नही जाता ।

    ग़ज़ल । दिल दुखाया नही जाता।

दर्द कितना भी कम हो मुस्कुराया नही जाता ।।
जख़्म मुहब्बत का हो तो भुलाया नही जाता ।।

माना कि हर कोई है प्यार के क़ाबिल यहा ।
पर हर किसी से दिल तो लगाया नही जाता ।।

रुसवा हो ही जाओगे किसी न किसी दिन तुम
बेख़ौफ़ अदाओं का मय पिलाया नही जाता ।।

टूट कर ये इल्म भी बिखर जायेगा इक दिन ।
इश्क़ में हर वादा तो निभाया नही जाता ।।

क्या करेगा वो तवज्जो अब तेरे एतबार की ।।
वज़्न ऐ हालात जिससे उठाया नही जाता ।।

साहिलों के पास अब भी हैं पड़ी वीरान राहें ।
हर अज़नबी को रास्ता दिखाया नही जाता ।।

भूलकर "रकमिश" न आना साहिलों के पास तुम ।
खुदी के लिए दिल किसी का दुखाया नही जाता ।।

                           @राम केश मिश्र 

सोमवार, 16 नवंबर 2015

ग़ज़ल।आराम नही आया तो ।

     ग़ज़ल।आराम नही आया तो।

आज तेरा ख़त ,तेरा पैगाम नही आया तो ।
टूट ही गया दिल, मेरा नाम नही आया तो ।

ख्वाबो के शहर में अब धुएं उठने लगे हैं ।
मैं तुमसे मिलने इक शाम नही आया तो ।

फर्क तो पड़ ही गया चाहतो में दूरियों से ।
बढ़ गये दिल के भी दाम, नही आया तो ।

प्यार तो तेरा इक जूनून था, ख्वाहिस थी ।
दर्द मिला दिल को इनाम ,नही आया तो ।

साहिलों से मैं चला था खोजने मंजिल कोई ।
साहिलों पर रह गया गुमनाम ,नही आया तो ।

आ ही जाता मैं तेरे  काशिस, तेरे पहलू में । 
छलक ही गया हुश्न -ऐ -जाम नही आया तो ।

फ़िक्र न थी ,दर्द था तुझसे बिछड़ जाने का ।
पर तुम तो लगा बैठे इल्जाम नही आया तो ।

हो रहे थे दर्द में नासूर मेरे दोस्त "रकमिश" ।
फिर कर गये बदनाम आराम नही आया तो ।

                               ..... राम केश मिश्र

नशा ए इश्क

ग़ज़ल   नशा ए इश्क अब छोड़ा न जाए ।  जमाने से मगर उलझा न जाए ।   बड़ी मासूम हैं उसकी अदाएं,   कि मुझसे और अब देखा न जाए ।   गरीबों ...