ग़ज़ल।दवा पाने नही निकला ।
तनिक आया हूँ गर्दिश में हवा खाने नही निकला ।
मुझे हर दर्द मालुम है दवा पाने नही निकला ।।।
पुराने हो गये मसले मग़र हर जख़्म ताज़ा है ।
ग़मो का लुफ़्त लेता हूँ वफ़ा पाने नही निकला ।।
बड़े दिन बाद पाया हूँ दिवानों की कोई महफ़िल ।
दिवानापन उमड़ आया ज़फ़ा गाने नही निकला ।।
नजऱ का तेज़ खंज़र वो छुपा है आज तक दिल में ।
तड़पता ऱोज दिल है पर ख़ुदा पाने नही निकला ।।
मुज़रिम हूँ दिवाना हूँ बेगाना हूँ आवारा हूँ ।।
मारा हूँ मुक़द्दर का सजा पाने नही निकला ।।
चला आया हूँ 'रकमिश' मैं लुटाकर प्यार की दौलत ।
मुझे है दर्द की ख़्वाहिश नफ़ा पाने नही निकला ।।
@राम केश मिश्र