रविवार, 18 जून 2017

दीवाने हो गये लेकिन ।

ग़ज़ल ।दीवाने हो गये लेकिन ।

तेरे  आग़ोश  के  शाये  पुराने  हो  गये लेकिन ।
उसी मदहोश हरक़त मे दिवाने हो गये लेकिन ।।

बहुत चाहा किसी के संग चलू मै ढूढ़ने मंजिल ।
वफ़ा तेरी मुहब्बत का चुकाने हो गये लेकिन ।।

चले आओ अभी यादों का हि बिस्तर सजाया हूं ।
मिलन अबतक अधूरा है ज़माने हो गये लेकिन ।।

सम्हाला था तेरे आने के पहले तक मेरे हमदम ।
रुके आंखों से अश्को को गिराने हो गये लेकिन ।।

तजुर्बा  है अलग तेरा  मुहब्बत  आजमाने  का ।
मिली फुर्सत मुझे ग़म से सयाने हो गये लेकिन ।।

यकीं मानो कि तन्हा हूं सँजोये याद हरपल की ।
ख़ुदा ही बेरहम निकला भुलाने हो गए लेकिन ।।

मिली न तू तेरे वादों  पे क़ायम तो रहा' रकमिश ।
तिरी चाहत मे लाखों दिल दुखाने हो गये लेकिन ।।

                                 राम केश मिश्र

ग़ज़ल।तगादे आ रहे घर तक ।

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           @ग़ज़ल ।तगादे आ रहे घर तक ।@

लिया क़र्ज़ा रक़ीबों से अमादे आ रहे घर तक ।
ग़रीबी  की  दशा देखो तगादे आ रहे घर तक ।। 

ख़बर उनको मिली शायद गया बाज़ार कुछ लेने ।
न पाया काम पर देरी  से सादे  आ रहे घर तक ।।

शहर की हर दुकानों पर मिरी तौहीनियाँ कहकर ।
किये  ग़ुस्से  को  बेक़ाबू  खरादे आ रहे घर तक ।।

पड़ी  फ़टकार सुनता मै  किये  बेबाक़  सर नीचे ।
मिरी इज्ज़त को पैरों तल हि रौंदे आ रहे घर तक ।। 

चिरागों तक नही जलते की उनके घर अंगीठी है ।
मिरे  जितने के कर्ज़े  के  बुरादे आ रहे घर  तक ।।

लगा बेशक़ हुजूमी से मिरे जज़्बात को धक्का ।
जुबां के ख़ंजरों से दिल कुरेदे आ रहे घर तक ।।

मुझे मनहूस सी लगती ख़ुदी की जिंदगी रकमिश ।
बुरे ख्यालों से  बोझिल से इरादे आ रहे घर  तक ।।

                              राम केश मिश्र

मेरे हिस्से मे पथ्थर तक नही आया ।

ग़ज़ल ।।

मुहब्बत मे मुहब्बत का हि मंज़र तक नही आया ।
थका मै ढूढ़ मंजिल को मेरा घर तक नही आया ।।

मिली सौगात दिल की है यहां सबको मुहब्बत मे ।
मेरे नाचीज़  हिस्से मे  पत्थर तक  नही आया ।।

रहा ताउम्र तन्हा ग़म  किसे मै  बेवफा  कहता  ।।
समझ मे प्यार का मतलब उम्रभर तक नही आया ।।

लकीरें हाथ मे कब तक बढ़ेगी  उम्र की यारो ।
मिली जो मौत हाथों मे ख़ंजर तक नही आया ।।

भरोशा था कभी शायद क़िस्मत का करिश्मा हो ।
उम्र ही ढल गयी सारी मुक़द्दर तक नही आया ।।  

पड़ा बरसों से सूना है घरौंदा प्यार का रकमिश ।
वफ़ा की बूं नही आयी सितमगर तक नही आया ।।
                             राम केश मिश्र

गुरुवार, 15 जून 2017

वतन के लिए ।

                       ग़ज़ल

ज़िन्दगी मेरी अर्पण वतन के लिए ।।
जान जाये तो अरि के दमन के लिए ।।

सांस चाहे भले हो मिरी आखिरी ।
मै जिऊंगा निख़ालिश चमन के लिए ।।

लाख़ गर्दिश वहां चाहे वीरान हो ।
पर तिरंगा रहेगा क़फ़न के लिए ।।

देश की शान तो है मिरी जिंदगी ।
मैं मिटाता रहूं हर जनम के लिए ।।

एक दुश्मन सलामत रहेगा नही ।
चीर सीने को दूंगा करम के लिए ।।

वक्त आएगा रकमिश कभी तो तिरा ।
पैर पीछे ना जायें परन के लिऐ ।।

                           राम केश मिश्र

बुधवार, 14 जून 2017

इश्क़ कोई ख़ैरात नही है ।

गीतिका

इश्क़ कोई ख़ैरात नही है ।
झूठी हर सौग़ात नही है ।।

मेरे तेरे प्यार मे यारा ।
पहले जैसी बात नही है ।।

मै तो शायद बदल गया हूं
पर तुझमे जज़्बात नही है ।।

और आंधियां ग़म की सहता
इस दिल के हालात नही है ।।

यादों मे तन्हाई ना हो ।
ऐसी कोई रात नही है ।।

अश्को से भीगा रहता हूं
सावन की बरसात नही है ।। 

और दुखो को सह पाऊँ मै ।
अब मेरी औकात नही है ।।  

                              राम केश मिश्र

इश्क़ मे लगने लगी है बोलियां ।

     ग़ज़ल।इश्क़ मे लगने लगी है बोलियां ।।

प्यार मे आयी ग़मो की आधियां ।
हो गयी वीरान दिल की बस्तियां ।। 

आँशुओ के ढेर पर सोना पड़ा ।
काम न आयी हमारी अर्जियां ।।

फ़लसफ़े हमने सुने थे प्यार के ।
इश्क़ मे लगने लगी है बोलियां ।।

वक़्त का मारा हुआ है आदमी ।
कौन करता है वफ़ा मे गलतियां ।।

एकतरफा प्यार तो होता नही ।।
दोनों हाथों से बजी है तालियां ।। 

आजमाना तू मुझे अब छोड़ दे ।
बीत जाएगी जफ़ा मे सर्दियां ।।

सुन तिरा रकमिश यहां बीमार है ।
ख़ुद वहां पर कर रहे हो मस्तियां ।।

                      -राम केश मिश्र
             

मंगलवार, 13 जून 2017

गीतिका।मुझको अपना यार समझ ले ।

गीतिका

मुझको ख़ुद का प्यार समझ ले ।
बिन कांटो का हार समझ ले ।। 

टूट गया तो गया काम से ।
इकतारा का तार समझ ले ।

दिल को तेरे परख रहा हूं  ।
चाहे अत्याचार समझ ले ।। 

एहसासों का रूप बनाता ।
भावों का सृंगार समझ ले ।

सन्देहों की जाल बिछाकर ।
डूब रहा मझधार समझ ले ।

डरा हुआ हूं ख़ामोशी से ।
डर को मेरी हार समझ ले ।।

मुस्कानों की एक अदा पर ।
बेशक़ हूं बीमार समझ ले ।। 

रकमिश तेरा हुआ दिवाना ।
चाहे तो बेकार समझ ले ।।

                       
                   रकमिश सुल्तानपुरी


एक नशा प्यार का छा गया है ग़ज़ब

ग़ज़ल।

दिल तुम्हारा मुझे भा गया  है ग़ज़ब ।
इक नशा प्यार का छा गया है ग़ज़ब ।। 

भर खिली आँख मे तेरी तस्वीर है ।
तन शरारा सुकूँ पा गया है ग़ज़ब ।। 

ज़म गया ज़ाम साक़ी पिलाये किसे ।
ग़ल लुटाने को नापा गया है ग़ज़ब ।। 

रुक गयी रूप पर आज है चाँदनी ।
ग़म पुराना कुरेदा गया है  ग़ज़ब  ।। 

लत लगी है तुम्हे देखने की सनम ।
दिल दुआ से दवा पा गया है ग़ज़ब ।।

धड़कने बढ़ गयी है यहां रूह की ।
इत्तिका की हवा पा गया है ग़ज़ब ।।

गुम तुम्हारी अदाओं मे रकमिश हुआ ।
सिलसिला का मज़ा पा गया है ग़ज़ब ।। 

              रकमिश माने -राम केश मिश्र

सोमवार, 12 जून 2017

ग़ज़ल।मन्ज़िले चल पड़ी रास्ता छोड़कर ।

     गजल।मंज़िले चल पड़ी रास्ता छोड़कर ।।

दोस्तों ने सभी फ़ासला छोड़कर ।
दर्द बेशक़ दिया दायरा छोड़कर ।।

इश्क़ भी हाशिये पर रुका रह गया ।
जख़्म रोने लगा आसरा छोड़कर ।। 

शख़्स रोता रहा देखकर साज़िशें ।
वक़्ते दर प्यार का मामला छोड़कर ।। 

एक तूफ़ान दिल मे सुरु क्या हुआ ।
अश्क़ ठहरा रहा ज़लज़ला छोड़कर ।। 

चाहता चाहता चाहता चल पड़ा ।
चाहते मुड़ गयी चाहता छोड़कर ।।

पास आया बड़ी मिन्नतों से मग़र ।
मंज़िले चल पड़ी रास्ता छोड़कर ।।

कौन सुनता भला दर्द रकमिश तेरा ।
मौत भी चल पड़ी दास्ताँ छोड़कर ।।

                            @ राम केश मिश्र

दोस्तों के लिये मैं रुका रह गया ।


       @ ग़ज़ल।दोस्ती के लिये मै रुका रह गया ।@

दोस्ती के लिये मै रुका रह गया ।
अश्क़ आंखों मे मेरे छुपा रह गया ।।

इश्क़ मे बेक़सी की हवा के लिए ।
एक अर्से से पाता सज़ा रह गया ।।

इश्क़ को जुस्तजू रास आयी नही ।
लाख़ चाहा मग़र फ़ासला रह गया ।।

लव्ज़ होठों पर आकर रुके से रहे ।
राज़ दिल का दिलों मे छुपा रह गया ।। 

सबको तौफा मिला दोस्ती का यहाँ ।
दोस्त ख़ामोश दिन देखता रह गया ।। 

साथ जत्था चला काफ़िलों का मिरे ।
पर अकेला यहाँ हर दफ़ा रह गया ।।

सिर्फ़ तन्हा मिला ज़िन्दगी मे मुझे ।
दर्द ही एक रकमिश, दवा रह गया ।। 

                                राम केश मिश्र

नशा ए इश्क

ग़ज़ल   नशा ए इश्क अब छोड़ा न जाए ।  जमाने से मगर उलझा न जाए ।   बड़ी मासूम हैं उसकी अदाएं,   कि मुझसे और अब देखा न जाए ।   गरीबों ...