सोमवार, 12 जून 2017

फ़ासला बढ़ता रहा ।

  -----------फ़ासला बढ़ता रहा ------------

दोस्तों का ज़िन्दगी भर दाख़िला बढ़ता रहा ।
दास्ताँ सुनकर वफ़ा की हौसला बढ़ता रहा ।। 

फ़ायदे की लाख़ कोशिश मे गवाँ दी जिंदगी ।
उम्रभर बस दर्द का सिलसिला बढ़ता रहा ।। 

हो गये सब ख़ाक अरमां छा गये बनके धुआँ ।
गर्दीशे तूफ़ान का इक ज़लज़ला बढ़ता रहा ।।

मुजरिमों के साथ मुज़रिम आईना बारूद का ।
हमवफ़ा की आरजू रख जो मिला बढ़ता रहा ।।

बावफ़ा की साख़ पर फिर आतिशों के ढ़ेर से ।
ज़ल गयी ज़ागीर दिल की मनचला बढ़ता रहा ।।

आफ़तों से बच नही पायी है दुनियां ये कभी ।
वक़्त दर तारीख़ दर फिर ग़िला बढ़ता रहा ।। 

मिट गये होते जहां के फ़लसफे रकमिश सभी ।
ज़िन्दगी से मौत का बस फ़ासला बढ़ता रहा ।।

                                    राम केश मिश्र

गुरुवार, 8 जून 2017

क्या प्रेम है जहाँ मे करके दिखा दिया ।

            *एक ग़ज़ल की कोशिश*

क्या प्रेम है जहाँ मे करके दिखा दिया ।
होता अमर है कैसे मरके दिखा दिया ।। 

यहाँ लोग जी रहे है इश्क़ की बदौलत ।
राँझा ने उम्रभर आहे भरके दिखा दिया ।।

लैला भी चाहती थी मजनूं को दर्द न हो ।
वो दर्द थी मुहब्बत हरके दिखा दिया ।।

राधा रही दिवानी शर्मोहया को छोड़ा ।
मीरा ने इस जहाँ मे तरके दिखा दिया । 

रोया था हर दिवाना तड़पी थी जिंदगी ।
ख़ूने ज़िगर से आंशू ढरके दिखा दिया ।।

ऐ शौक़ है ख़ुदा की हर चीज़ लाज़िमी है ।
है बेज़ुबान तूफ़ां छल के दिखा दिया ।।

ऐ 'रक,मिली जुदाई साहिलों के माफ़िक़ ।
थे रहनुमां वे इश्क़ पड़के दिखा दिया ।। 

                         @राम केश मिश्र

Ram Kesh Mishra

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मंगलवार, 6 जून 2017

यहाँ पर मुस्कुराने मे।

         ग़ज़ल -यहाँ पर मुस्कुराने मे

तलाशे इश्क़ मे निकला जफ़ा के आशियाने मे ।
बड़ी तकलीफ़ पाया हूं यहाँ पर मुस्कुराने मे ।।

मिली जो मतलबी दुनियां तराशेगी मुहब्बत को ।
मुझे मालूम है लेकिन मज़ा है आजमाने मे ।।

वफ़ा के नाम पर उनको खुदा ही मान बैठा हूं ।
मुझे दिलचस्पी है उनमे उन्हें किस्सा सुनाने मे ।।

हँसेगी देखकर दुनियां जलता घर ग़रीबों का ।
मदद करता नही कोई जरा कर्जा चुकाने मे ।।

न रिस्ते है न रिस्तों की कोई परवाह करता है ।
नही जज़्बात है क़ायम बेक़ाबू इस जमाने मे ।।

हक़ीक़त मे कहर बरपा जवां है गमसुदा आलम ।
कहाँ तकलीफ़ होती है किसी का दिल दुखाने मे ।।

मुहब्बत मे वकीली का मुझे एतराज है रकमिश । 
बहें है आँख से आंसू जरा सा गुनगुनाने में । 

                                     राम केश मिश्र

गुरुवार, 1 जून 2017

मेरे कातिलों को ख़बर कीजिये ।

ग़ज़ल।। मेरे कातिलों को ख़बर कीजिये ।

वक्त काफ़ी है थोड़ा सबर कीजिये ।
मेरे कातिलों को ख़बर कीजिये ।। 

दर्द का शौक़ पाला है हमने यहाँ ।
ग़म उन्हें क्यो उनको निडर कीजिये ।। 

वक़्त रुकता नही है खुदा के लिये ।
वक्त आये तो उनको इधर कीजिये ।।

डूब जायेगे आएगा जब ज़लज़ला ।
तब तलक दर्द को बेअसर कीजिये ।।

कोई सीसा नही टूट जाए जो दिल ।
मौत वालो को कह दो ज़िगर कीजिये ।।

इस मुहब्बत मे वे भी गुनेहगार है  ।
वक्ते दर आज उनको नज़र कीजिये ।।

मंजिले पास आएगी रकमिश' तिरी ।
इश्क़ तन्हा है थोड़ा सफ़र कीजिये ।।  

                      राम केश मिश्र

रविवार, 28 मई 2017

ग़ज़ल। मेरा यार मुझसे ख़फ़ा हो रहा है ।

गजल/मेरा यार मुझसे ख़फ़ा जो रहा है ।
वज़्न- १२२-१२२-१२२-१२२

मेरा जख़्म फ़िर से रवां हो रहा है ।
मेरा यार मुझसे ख़फ़ा हो रहा है ।।

जिसे सब्र की राह मैने दिखाया ।
वही गैर पर अब फ़ना हो रहा है ।।

कभी आँख मे अश्क़ आये नही थे ।
सुरू दर्द का ज़लज़ला हो रहा है ।।

मुहब्बत मे मेरे बना था मसीहा ।
किसी गैर का वो ख़ुदा हो रहा है ।।

तिरा फ़ैसला दर्द देगा यक़ीनन ।
बड़े शौक़ से तू जुदा हो रहा है ।।

वफ़ाई तुम्हें रास आयी नही क्यों  ।
वफ़ा था कभी बावफा हो रहा है ।।

न जा आज रकमिश बड़ी बेख़ुदी है ।
जरा पास हो तो दवा हो।  रहा है ।। 

                               राम केश मिश्र

बन गया पत्थर ज़माना ।

ग़ज़ल (बह्र रहित)
                   बन गया पत्थर ज़माना ।

दे रहा सबको यहाँ ख़ुशियों का इक घर ज़माना ।
बात जब आयी मिरी तो बन गया पत्थर ज़माना ।।

मैं निखालिश प्यार पर कर भरोसा चल रहा था ।
हँस रहा दिल पर मेरे  जख़्म को देकर ज़माना ।।

टूट तो वैसे गया हूं दर्द -ऐ -दिल हालात  से मैं ।
अब चुभोता जा रहा क्यो बेवज़ह नस्तर ज़माना ।।

अश्क़ आंखों मे  नही फ़िर भी कुरेदे जा रहा हूं ।
शक़ उसे है आज़माता जख़्म पर खंज़र ज़माना ।। 

लड़ रहा तन्हाइयों से इश्क़ का मारा मुअक्किल ।
हो गया ख़ामोश मसलन  देखता मंजर ज़माना ।।

कर रहा बेशक़ गुज़ारिश रूह मेरी बख़्स दे अब ।
जबकि पीछे पड़ गया है हाथ ही धोकर ज़माना ।।

मन्नतें माँगी थी रकमिश' उम्र भर बस प्यार की ।
कर दिया बदनाम घायल इश्क़ को लेकर ज़माना । 

                                ©राम केश मिश्र

ग़ज़ल । मुझे हर शख्स प्यारा है ।


             ग़ज़ल। मुझे हर शक़्स प्यारा है ।।
मापनी-1222 1222 1222 1222

किसे मांगू ख़ुदा से मैं यहाँ हर शक़्स मेरा है ।
जिसे मै रहनुमा समझा वही दिल का लुटेरा है ।।

मिला जो अज़नबी मुझको दिलों का घर दिखा बैठा ।
मेरे दिल मे जरा झाँको लुटेरों का बसेरा है ।।

गये वो भूल तन्हा दिल उन्हे खुशियां मिली बेसक ।
मेरे आग़ोश मे फ़ैला जफ़ा- ऐ- ग़म का घेरा है ।।

दिखायी प्यार की राहें जलाकर रौशनी दिल की ।
उन्हें मंजिल मिली अबतक मेरे घर पर अंधेरा है ।।

कहाँ तक ढूढ़ कर लाता दिलों के लाख़ टुकड़ों को ।
रहा जो हौसला बाक़ी ग़मों मे ही बिखेरा है ।। 

ज़रा नज़दीक आ देखों खुदे है फ़लसफ़े तेरे ।
तुम्हारे ज़ख्म इस दिल पर अब तक जो उकेरा है ।।

वफ़ाई लाख़ तू कर ले मिलेगा ख़ाक ही रकमिश, ।
ख़ुदा का है खुदा लेगा न मेरा है न तेरा  है ।।

                              राम केश मिश्र

मुझे आज अपनी कहानी सुना दो ।

ग़ज़ल

ग़मों की बेमानी जफ़ाएँ भुला  दो ।
मुझे आज अपनी कहानी बता दो ।।

बहे अश्क़ आँखे  हुई  बेमज़ा  है ।
दिले दरमियाँ आज पर्दा हटा  दो ।।

ख़ुदा के लिये आज कहके हक़ीक़त ।
वफ़ा बेवफ़ा की  मुहब्बत  सुना दो ।।

हुई शाम आयी अँधेरी घड़ी है ।
मिरे साथियां बेक़सी को भुला दो ।।

ज़रा सी कठिन है नयी राह लेकिन ।
करो फ़ैसला जामे उल्फत पिला दो ।।

सुरू तो करोगे नयी ज़िन्दगी फ़िर ।
हमारे  लिये  ही  जरा  मुस्कुरा  दो ।।

तिरे दर्द की है दवा सिर्फ़ रकमिश'।
मिरे सांस से तुम ज़रा गुनगुना दो ।।

                रकमिश=राम केश मिश्र
           

गुरुवार, 25 मई 2017

हो गये अपने पराये लोग सब ।

ग़ज़ल । हो गये अपने पराये लोग सब ।

हो गये अपने पराये लोग सब ।
बेबसी मे है भुलाये लोग सब ।।

प्यार मे दिल को बिछाना था उन्हें ।
दर्द मे जबकि न आये लोग सब ।।

जीत मे खुशियों के बादल छा गये ।
हार मे  नजरें चुराए लोग सब ।।

जख़्म मे मरहम लगाना था जिन्हें ।
बेरहम बन दिल दुखाये लोग सब ।।

वक्त की थी बन्दिशें मेरे लिये ।
वक्ते दर कहके न आये लोग सब ।।

अश्क़ के दरिया मे डूबा मै रहा ।
झूठ के आँसू बहाये लोग सब ।।

तोड़ के रश्में वफ़ा रकमिश, यहाँ ।
बेवज़ह वादे निभाये लोग सब ।।

                             राम केश मिश्र

नशा ए इश्क

ग़ज़ल   नशा ए इश्क अब छोड़ा न जाए ।  जमाने से मगर उलझा न जाए ।   बड़ी मासूम हैं उसकी अदाएं,   कि मुझसे और अब देखा न जाए ।   गरीबों ...