शुक्रवार, 19 फ़रवरी 2016

ग़ज़ल।जिंदगी झूठी लगी ।

     ग़ज़ल।जिंदगी झूठी लगी ।

रूप तेरा जो खिला तो रोशनी झूठी लगी ।
एक दिन तुम मिल गये क्या ज़िन्दगी झूठी लगी ।।

लाखों चेहरे दे गये झाँसा मुझे मासूम बन ।
जो मिली बेदाग़ मुझको ,सादगी झूठी लगी ।।

लम्हा लम्हा उम्रभर प्यार में क़ायल रहा पर
जो झुकी तेरी नज़र हर बन्दगी झूठी लगी ।।

साहिलों को ही समझ बैठा था मंजिल यार मैं ।
इश्क़ की सारी मसक्कत तश्नगी झूठी लगी ।।

देखता हूँ आपके माफ़िक़ सकूँनत न मिली ।
आप ही आये चले तो हर हँसी झूठी लगी ।।

थी क़सिस 'रकमिश' निगाहे प्यार में ज़ब भी मिलीं ।
उफ़!! तुम्हारी ये क़सिस हर बेबसी झूठी लगी ।।

                     ©©©राम केश मिश्र

मंगलवार, 16 फ़रवरी 2016

ग़ज़ल।एक दिन का प्यार था ।

      ग़ज़ल।एक दिन का प्यार था।

उम्र भर की दोस्ती में एक दिन का प्यार था।
हमसफ़र था संगदिल, बेवफा बेकार था ।।

चाहतों के बीच में ही पल रही थी दूरियाँ ।
इश्क़ की उस बेरुख़ी का हो गया एतबार था ।

एक पैमानें की ख़्वाहिश में ज़ला है दिल मेरा ।
किश्तियाँ भी डूबती रह गयी, मझधार था ।।

ग़ैर के शाये में जाकर मुस्कराने वे लगे ।
हो गये तबसे ज़ुदा वो आख़िरी दीदार था ।।

दिल की धड़कन ले गये वे तोड़कर इस रूह से ।
थी ख़ुसी उस पार जबकि ग़म रुका इस पार था ।।

तिनका तिनका जल गया वह था घरौंदा एक ही ।
आंशुओं के सींचने से जो कभी तैयार था।।

ग़म के अँधियारे मिले है आज तन्हा साहिलों पर ।
डूबने किश्ती लगी पर दर्द बरकरार था ।।

रह गयी थी रश्म "रकमिश" याद की तन्हाइयों में ।
बस निभाता रहा मैं बेरुखा किरदार था।।

                   ©©©

सोमवार, 15 फ़रवरी 2016

ग़ज़ल।ज़ोर ऐ आज़माइस।

ग़ज़ल.....

           आज ले चलते है उन वादियों में , जहा पर बेफ़िक्र निग़ाहों की चहलक़दमी होती है । जहा बन्दगी नही तश्नगी होती है । वो चेहरा जो दीवानगी की ज़न्नत होता है । जो दिल को रौनक करता है । उसी की चाह में बेपरवाह ये दीवाने और उनके तड़पते ख्यायलात उफ़ !!! वो बेकसी । हर तऱफ चाहतें ही चाहते । महफ़िल ही महफ़िल । हर चेहरे पर वफ़ा-ऐ-इश्क़ की झकल में मसगूल मुस्कान ठहरती शाम की वो आबोहवा । उधर अदाओं की नुमाइस तो इधर शराफ़त की पेशकस । उधर मासूमियत का ज़ाम ऐ नज़ाकत तो इधर वफ़ा का हुजूम । फ़िर सुरू होता है दौर ऐ आज़माइस ।
          जी !! मेरे अजीज़ हमसफ़र दोस्तों । तब होता है हिसाब दीवानों की हरक़त का । यक़ीनन इश्क़ बेपरवाह है । बेदाग़ है । मग़र यही मुहब्बत का फ़ितूर है ।दस्तूर है इल्म का । दर व दर ,हमदिल संगदिल की क़ीमत लगती है । हर साँस हर धङकन की क़ीमत लगती है । दिल और सिर्फ़ दिल ही फ़ैसला करता है । और रूह तक काँप जाती है अपने ही दिल की बेबसी पर जब वह किसी ग़ैर की नज़रों और ईशारों की गिरफ़्त में होते है । मेरे दोस्तों ज़ब तड़पता है दिल, कसमसाती है रात ।तब निकलती है इक आह ।तब बनती है एक ग़ज़ल ।।

ज़बाने भर से कहता हूँ कोई गद्दार न निकला ।।
मुहब्बत से करे तौबा कोई क़िरदार न निकला । 

       बाक़ी फ़िर.........

बुधवार, 10 फ़रवरी 2016

ग़ज़ल।गुनाहों की कहानी है ।

    ग़ज़ल।गुनाहों की कहानी है ।

करो जो प्यार तो समझो गुनाहों की कहानी है ।
दिल ऐ बेबस महज़ दिलकश अदाओं की निशानी है ।

वफ़ा ऐ इश्क़ में देखा तबाही से भरे मंज़र ।
ख़ुसी के एक पल की भी हमें कीमत चुकानी है ।

झलक ज़न्नत की पाया तो जली ग़म की मसालें थी ।
बुझे न अश्क़ मसलन अब बचा आँखों में पानी है ।।

ख़्वाहिस रह नही पाती कभी महफूज़ साहिल पर ।
वही दिल तोड़ने की सब बनी रश्मे पुरानी हैं ।

यहाँ हालात तकलीफे मुक़र्रर कर दिये जाते ।
यकीनन मौत से पहले मिली यादें रूहानी हैं ।

ग़मे तन्हाईयां "रकमिश" सकूनत की हवा देती ।
क़सिस ऐ दर्द में बेकस जवानी की नदानी है ।

                 रकमिश सुल्तानपुरी

ग़ज़ल।दीवाने लोग आते थे।

     ग़ज़ल ।दिवाने लोग आते थे ।

जवां साहिल हुआ तन्हा बिताने लोग आते थे ।
ग़मो से ठोकरें पाकर दिवाने लोग आते थे । 

भले हो दर्द की नौबत मग़र मगरूर थे काफ़ी ।
किये जो इश्क़ में वादे निभाने लोग आते थे ।

दवा-ऐ-दर्द के ख़ातिर मुसाफ़िर वक्त के मारे ।
मिले हर एक ज़ख्मों को दिखाने लोग आते थे ।

खफाई, खौफ ,तन्हाई, जुदाई ,बेकसी लेकर ।
होने रूबरू दिल के बहाने लोग आते थे ।।

इशारे हुश्न भर साकी छलक जाते थे पैमाने ।
छोड़ दुनियां के रंजोगम मयख़ाने लोग आते थे ।

मग़र हालात के चलते वीराना हो गया साहिल ।
लुटी है प्यार की दुनिया ,लुटाने लोग आते थे ।।

दरिया भर गया "रकमिश" बहे जो प्यार में आँसू ।
छुपाकर अश्क़ की लहरें नहाने लोग आते थे ।।
                             
                     ©रकमिश सुल्तानपुरी

सोमवार, 8 फ़रवरी 2016

ग़ज़ल साहिल ।तालाश ये साहिल

ग़ज़ल साहिल ।तलाश ऐ साहिल ।

  आप ग़ज़ल कैसे लिखते हो ? यही लब्ज़ होते है ;मेरे हमसफ़र हमदिलों के । माफ़ी मांगने का हक़ भी मुझे नही है । मुख़ातिब हो नही पाता । मग़र उन्हें इल्तिला कर दू क़ि दीवाना बनना ही पड़ेगा । ये इश्क़ है । दीवानगी है । जन्नते-सुरूर है । ये खुद ख़ुदा का ख़ुमार है । जो बेकसी है , प्यार है । और इस प्यार का आग़ाजनाज़ुक उम्र से निगाहों की तपन से मज़बूर । ख्वाहिशों के सफ़र में ऱप्ता ऱप्ता साहिलों पर फ़िसलते क़दम । रिस्तों की सुरुआत । वो अज़नबी और फ़िर चाहतों का अनजाना सैलाब । वो मदहोश चितवन । 

रात में बनती तस्वीरें । और तसवीरों पर सजी मुस्कान । वो बेख़ौफ़ इशारे । अकेलेपन की बेवसी । तब जाकर सुरु होती है दास्ताँ ऐ मुहब्बत । खिलते फूल और गुनगुनाती शाम । शाम ही नही ,अंधेरों के झरोखें उकेरते है वो चेहरा जिसकी चाहत है । यहा से सुरु होती है तालाश ऐ जिंदगी । यही से भटकती है राहे । यही से मिलती है जन्नते-झलक । इस नये एहशास का वज़्न दिल को तसल्ली देता है । अग़र मुलाकातों का सिलसिला जाऱी रहा तो शख़्स दर शख़्स आजमाइसो के दौर का भी आगाज़ यही से होता है । और तब निकलती है एक आह एक तड़पन । और तब बनती है ग़ज़ल ।।
           
समन्दर डूब सब निकले बैठे हम किनारे थे ।
बुझी न प्यास ऐ साकी इशारे ही इशारे थे ।।

  शेष फिर........
               .... रकमिश सुल्तानपुरी

ग़ज़ल साहिल ।तालाश ये साहिल

ग़ज़ल साहिल ।तलाश ऐ साहिल ।

  आप ग़ज़ल कैसे लिखते हो ? यही लब्ज़ होते है ;मेरे हमसफ़र हमदिलों के । माफ़ी मांगने का हक़ भी मुझे नही है । मुख़ातिब हो नही पाता । मग़र उन्हें इल्तिला कर दू क़ि दीवाना बनना ही पड़ेगा । ये इश्क़ है । दीवानगी है । जन्नते-सुरूर है । ये खुद ख़ुदा का ख़ुमार है । जो बेकसी है , प्यार है । और इस प्यार का आग़ाजनाज़ुक उम्र से निगाहों की तपन से मज़बूर । ख्वाहिशों के सफ़र में ऱप्ता ऱप्ता साहिलों पर फ़िसलते क़दम । रिस्तों की सुरुआत । वो अज़नबी और फ़िर चाहतों का अनजाना सैलाब । वो मदहोश चितवन । 

रात में बनती तस्वीरें । और तसवीरों पर सजी मुस्कान । वो बेख़ौफ़ इशारे । अकेलेपन की बेवसी । तब जाकर सुरु होती है दास्ताँ ऐ मुहब्बत । खिलते फूल और गुनगुनाती शाम । शाम ही नही ,अंधेरों के झरोखें उकेरते है वो चेहरा जिसकी चाहत है । यहा से सुरु होती है तालाश ऐ जिंदगी । यही से भटकती है राहे । यही से मिलती है जन्नते-झलक । इस नये एहशास का वज़्न दिल को तसल्ली देता है । अग़र मुलाकातों का सिलसिला जाऱी रहा तो शख़्स दर शख़्स आजमाइसो के दौर का भी आगाज़ यही से होता है । और तब निकलती है एक आह एक तड़पन । और तब बनती है ग़ज़ल ।।
           
समन्दर डूब सब निकले बैठे हम किनारे थे ।
बुझी न प्यास ऐ साकी इशारे ही इशारे थे ।।

  शेष फिर........
               .... रकमिश सुल्तानपुरी

ग़ज़ल साहिल ।तालाश ये साहिल

ग़ज़ल साहिल ।तलाश ऐ साहिल ।

  आप ग़ज़ल कैसे लिखते हो ? यही लब्ज़ होते है ;मेरे हमसफ़र हमदिलों के । माफ़ी मांगने का हक़ भी मुझे नही है । मुख़ातिब हो नही पाता । मग़र उन्हें इल्तिला कर दू क़ि दीवाना बनना ही पड़ेगा । ये इश्क़ है । दीवानगी है । जन्नते-सुरूर है । ये खुद ख़ुदा का ख़ुमार है । जो बेकसी है , प्यार है । और इस प्यार का आग़ाजनाज़ुक उम्र से निगाहों की तपन से मज़बूर । ख्वाहिशों के सफ़र में ऱप्ता ऱप्ता साहिलों पर फ़िसलते क़दम । रिस्तों की सुरुआत । वो अज़नबी और फ़िर चाहतों का अनजाना सैलाब । वो मदहोश चितवन । 

रात में बनती तस्वीरें । और तसवीरों पर सजी मुस्कान । वो बेख़ौफ़ इशारे । अकेलेपन की बेवसी । तब जाकर सुरु होती है दास्ताँ ऐ मुहब्बत । खिलते फूल और गुनगुनाती शाम । शाम ही नही ,अंधेरों के झरोखें उकेरते है वो चेहरा जिसकी चाहत है । यहा से सुरु होती है तालाश ऐ जिंदगी । यही से भटकती है राहे । यही से मिलती है जन्नते-झलक । इस नये एहशास का वज़्न दिल को तसल्ली देता है । अग़र मुलाकातों का सिलसिला जाऱी रहा तो शख़्स दर शख़्स आजमाइसो के दौर का भी आगाज़ यही से होता है । और तब निकलती है एक आह एक तड़पन । और तब बनती है ग़ज़ल ।।
           
समन्दर डूब सब निकले बैठे हम किनारे थे ।
बुझी न प्यास ऐ साकी इशारे ही इशारे थे ।।

  शेष फिर........
               .... रकमिश सुल्तानपुरी

ग़ज़ल साहिल ।तालाश ये साहिल

ग़ज़ल साहिल ।तलाश ऐ साहिल ।

  आप ग़ज़ल कैसे लिखते हो ? यही लब्ज़ होते है ;मेरे हमसफ़र हमदिलों के । माफ़ी मांगने का हक़ भी मुझे नही है । मुख़ातिब हो नही पाता । मग़र उन्हें इल्तिला कर दू क़ि दीवाना बनना ही पड़ेगा । ये इश्क़ है । दीवानगी है । जन्नते-सुरूर है । ये खुद ख़ुदा का ख़ुमार है । जो बेकसी है , प्यार है । और इस प्यार का आग़ाजनाज़ुक उम्र से निगाहों की तपन से मज़बूर । ख्वाहिशों के सफ़र में ऱप्ता ऱप्ता साहिलों पर फ़िसलते क़दम । रिस्तों की सुरुआत । वो अज़नबी और फ़िर चाहतों का अनजाना सैलाब । वो मदहोश चितवन । 

रात में बनती तस्वीरें । और तसवीरों पर सजी मुस्कान । वो बेख़ौफ़ इशारे । अकेलेपन की बेवसी । तब जाकर सुरु होती है दास्ताँ ऐ मुहब्बत । खिलते फूल और गुनगुनाती शाम । शाम ही नही ,अंधेरों के झरोखें उकेरते है वो चेहरा जिसकी चाहत है । यहा से सुरु होती है तालाश ऐ जिंदगी । यही से भटकती है राहे । यही से मिलती है जन्नते-झलक । इस नये एहशास का वज़्न दिल को तसल्ली देता है । अग़र मुलाकातों का सिलसिला जाऱी रहा तो शख़्स दर शख़्स आजमाइसो के दौर का भी आगाज़ यही से होता है । और तब निकलती है एक आह एक तड़पन । और तब बनती है ग़ज़ल ।।
           
समन्दर डूब सब निकले बैठे हम किनारे थे ।
बुझी न प्यास ऐ साकी इशारे ही इशारे थे ।।

  शेष फिर........
               .... रकमिश सुल्तानपुरी

बुधवार, 3 फ़रवरी 2016

ग़ज़ल।यकीं खुद पे हमारा है ।


       ग़ज़ल। यकीं ख़ुद पे हमारा है ।

बिछड़कर जा रहे मुझसे बची यादें सहारा है ।
शरारत से भरे दिन की तरफ मेरा इशारा है ।।

मिले थे हमसफ़र बनकर मग़र जाना तुम्हे होगा ।
हमारी है यही मंजिल तुम्हारा तो किनारा है ।।

यक़ीनन आप जायेंगे तो दिल मेरा भी रोयेगा ।
ख़ुशी तुमको मिले सारी मुझे ये दर्द प्यारा है ।।

हुई जो भूल मुझसे तो उसे तुम दिल पे मत लेना ।
सलीक़ा जो उचित समझा तुम्हे मैंने निखारा है ।।

सजेगी फ़िर यहाँ महफ़िल कभी हम साथ न होंगे ।
मग़र चेहरे पे हर चेहरा लगेगा कि तुम्हारा है ।।

ग़मो के और भी झोंके "रकमिश" हैं तुम्हे सहने ।
मग़र मंजिल मिले तुमको यकीं खुद पे हमारा है ।।

                     ©रकमिश सुल्तानपुरी

नशा ए इश्क

ग़ज़ल   नशा ए इश्क अब छोड़ा न जाए ।  जमाने से मगर उलझा न जाए ।   बड़ी मासूम हैं उसकी अदाएं,   कि मुझसे और अब देखा न जाए ।   गरीबों ...