बुधवार, 9 दिसंबर 2015

ग़ज़ल।हुआ बदनाम 'रकमिश' है।

    ग़ज़ल।हुआ बदनाम रकमिश है ।

अदाओं की कशिश महफ़िल गवाहों की नवाज़िश है ।
तुम्हारे प्यार का मौका कोई गुमनाम साज़िश है ।।

मुझे मन्ज़ूर है फिर भी निभाकर रश्म जाऊँगा ।
लुटा दी जिंदगी हमने तुम्हारी एक कोशिस है ।।

यहा हमदम,यहा रहबर,यहाँ संगदिल दिवाने सब ।
लगे दिल को लगाने सब हुये बेदाम बंदिश है ।।

हुआ है हाल दिल का क्या अगर पूंछो तो मत पूछो ।
तुम्हारे इश्क़ से नफ़रत ख़ुदी के दिल से रंजिश है ।।

तुम्हारे दर पे आया हूँ मलाल-ऐ-इश्क से बोझिल ।
बताने भर कि दुनिया में हज़ारों दर पे नरगिस हैं ।।

गुरूं मतकर, ज़फ़ा मतकर, इबादत हुश्न की कर ले ।
तवज्जो सीख़ साहिल पर हुआ बदनाम "रकमिश" है ।।

                        @राम केश मिश्र

मंगलवार, 8 दिसंबर 2015

ग़ज़ल।यहा इज्ज़त नही मिलती।

   ग़ज़ल।यहा इज्जत नही मिलती।

मुहब्बत में गुनाहों से जिन्हें मोहलत नही मिलती ।
खुदाई है खुदा की पर कभी रहमत नही मिलती ।

छिपी मासूम चेहरों पर गुनाहों की कहानी है ।
अदाओं की नुमाइस से इन्हें फ़ुरसत नही मिलती ।

यक़ीनन ढह ही जायेगी हमारे ख़वाब की मंजिल ।
मुझे मालूम है फिर भी तनिक राहत नही मिलती ।

सहेगे और भी सदमे तुम्हारी चाह में बेबस ।
चला मैं दूर जाऊँगा यहा नफ़रत नही मिलती ।

पलटकर देखने की तुम करोगे लाख़ कोशिस पर ।
हुई बेज़ार नजरो से कभी जन्नत नही मिलती ।

बहुत नाज़ुक तज़ुर्बे है तुम्हारे प्यार के 'रकमिश' ।
शहर से जा रहा तेरे यहा इज्ज़त नही मिलती ।

                       @राम केश मिश्र

रविवार, 6 दिसंबर 2015

ग़ज़ल।दवा पाने नही निकला।

   ग़ज़ल।दवा पाने नही निकला ।

तनिक आया हूँ गर्दिश में हवा खाने नही निकला ।
मुझे हर दर्द मालुम है दवा पाने नही निकला ।।।

पुराने हो गये मसले मग़र हर जख़्म ताज़ा है ।
ग़मो का लुफ़्त लेता हूँ वफ़ा पाने नही निकला ।।

बड़े दिन बाद पाया हूँ दिवानों की कोई महफ़िल ।
दिवानापन उमड़ आया ज़फ़ा गाने नही निकला ।। 

नजऱ का तेज़ खंज़र वो छुपा है आज तक दिल में ।
तड़पता ऱोज दिल है पर ख़ुदा पाने नही निकला ।।

मुज़रिम हूँ  दिवाना हूँ बेगाना हूँ आवारा हूँ ।।
मारा हूँ मुक़द्दर का सजा पाने नही निकला ।। 

चला आया हूँ 'रकमिश' मैं लुटाकर प्यार की दौलत ।
मुझे है दर्द की ख़्वाहिश नफ़ा पाने नही निकला ।। 

                        @राम केश मिश्र

शनिवार, 5 दिसंबर 2015

शेर।किस्से दर्द के अक्सर।

    ।।शेर।। किस्से दर्द के अक्सर।

करूँ किससे शिकायत मैं तुम्हारे प्यार की संगदिल ।
साहिल से समन्दर तक तुम्हारी ही तो चर्चा है ।।

डूबकर देखा हूँ एहसासों की तपिस के शाये में ।
खुद की चाहतो की कही भी मंजिल नही पाया ।

यहा के लोग है कातिल सजा ऐ मौत से पहले ।।
हजारो बार मरते है मुहब्बत में मुअक्किल अब ।।

मुहब्बत से जो बच निकले उन्हें नफरत ने मारा है ।
भरी महफ़िल में अब भी वो तन्हा है अकेले है ।।

वहा भी सब्र न मिलता यादों की रवानी से ।।
किस्से दर्द के अक्सर दिनोदिन याद रहते है ।।

                         @राम केश मिश्र

बुधवार, 2 दिसंबर 2015

ग़ज़ल।यही दस्तूर होता है ।

     ग़ज़ल। यही दस्तूर होता है ।

जिसे चाहो मुहब्बत में वही मजबूर होता है ।
रहे तन्हा,उदासी ,गम बड़ा मशगूल होता है ।।

मिलेगीं एक पल खुशियां नजर भर अश्क़ आयेंगे ।
उम्रभर फासले मिटते मग़र वह दूर होता है ।।

बनेंगे रोज़ यादों के झरोंखे चाँद में चेहरा  ।
यही सच है मुहब्बत का यही दस्तूर होता है ।।

ख़ुशी के एक लम्हे जो हमे जीना सिखाएंगे ।
बनेगे जिंदगी के गम ज़रा भरपूर होता है ।।

ख्वाबो की जमी पर ही आहे ऱोज उभरेंगी ।
मिले जो ख़ुशनुमा साहिल असल में दूर होता है ।।

मंजिलें पास ही होंगी मिलेंगे रास्ते खुद से ।
जिंदगी कट भी जाये पर नही मंजूर होता है ।।

मिलेंगी दर्द की मजलिश बेशक गम के मंजर भी ।
यकीनन जख्म हो ताज़ा गमे नासूर होता है ।।

करो तुम कूँच साहिल से "रकमिश"बेवफा दुनिया ।
यहा नादान दिल वाले नशेमन चूर होता है ।।

                            @राम केश मिश्र

बुधवार, 25 नवंबर 2015

ग़ज़ल । दिल दुखाया नही जाता ।

    ग़ज़ल । दिल दुखाया नही जाता।

दर्द कितना भी कम हो मुस्कुराया नही जाता ।।
जख़्म मुहब्बत का हो तो भुलाया नही जाता ।।

माना कि हर कोई है प्यार के क़ाबिल यहा ।
पर हर किसी से दिल तो लगाया नही जाता ।।

रुसवा हो ही जाओगे किसी न किसी दिन तुम
बेख़ौफ़ अदाओं का मय पिलाया नही जाता ।।

टूट कर ये इल्म भी बिखर जायेगा इक दिन ।
इश्क़ में हर वादा तो निभाया नही जाता ।।

क्या करेगा वो तवज्जो अब तेरे एतबार की ।।
वज़्न ऐ हालात जिससे उठाया नही जाता ।।

साहिलों के पास अब भी हैं पड़ी वीरान राहें ।
हर अज़नबी को रास्ता दिखाया नही जाता ।।

भूलकर "रकमिश" न आना साहिलों के पास तुम ।
खुदी के लिए दिल किसी का दुखाया नही जाता ।।

                           @राम केश मिश्र 

सोमवार, 16 नवंबर 2015

ग़ज़ल।आराम नही आया तो ।

     ग़ज़ल।आराम नही आया तो।

आज तेरा ख़त ,तेरा पैगाम नही आया तो ।
टूट ही गया दिल, मेरा नाम नही आया तो ।

ख्वाबो के शहर में अब धुएं उठने लगे हैं ।
मैं तुमसे मिलने इक शाम नही आया तो ।

फर्क तो पड़ ही गया चाहतो में दूरियों से ।
बढ़ गये दिल के भी दाम, नही आया तो ।

प्यार तो तेरा इक जूनून था, ख्वाहिस थी ।
दर्द मिला दिल को इनाम ,नही आया तो ।

साहिलों से मैं चला था खोजने मंजिल कोई ।
साहिलों पर रह गया गुमनाम ,नही आया तो ।

आ ही जाता मैं तेरे  काशिस, तेरे पहलू में । 
छलक ही गया हुश्न -ऐ -जाम नही आया तो ।

फ़िक्र न थी ,दर्द था तुझसे बिछड़ जाने का ।
पर तुम तो लगा बैठे इल्जाम नही आया तो ।

हो रहे थे दर्द में नासूर मेरे दोस्त "रकमिश" ।
फिर कर गये बदनाम आराम नही आया तो ।

                               ..... राम केश मिश्र

मंगलवार, 10 नवंबर 2015

ग़ज़ल । ख़ुद रौशनी जलने लगी है ।

   ग़ज़ल । ख़ुद रोशनी जलने लगी है ।
             (दीपावली विशेष)

अब रोशनी क्यों जुल्म की ये बन्दगी करने लगी है ।
आजकल क्यों चाल दुनियां दोगली चलने लगी है ।।

मन्नतो से कुछ नही होगा जलाना दीप तुमको ।
अंधकारों की निकम्मी बेरुखी बढ़ने लगी है ।।

मजलिसों में ,महफ़िलो में , साहिलों पर चल दिखा दें ।
है रुआँसे लोग सब आँख भी भरने लगी है ।।

हर तरफ़ है ख़ौफ़ के मंज़र पड़ा गुमनाम साहिल ।
दर्द की आहों पर छायी बेबसी पलने लगी है ।।

क्या मिलेगा मौत से जादा मुसाफ़िर सोच ले तू ।
उम्र का मत कर भरोसा जिंदगी छलने लगी है ।।

हौंसला रख पथ्थरों में भी ख़ुदा मिलता यहा पर ।
चल दिखा दे रास्ते अब अस्मिता मरने लगी है ।।

चल जला ले रौशनी अब हम मिशाले प्यार की ।
बढ़ रही है गम की रौनक़ शाम भी ढलने लगी है ।।

फ़िक्र मतकर तू चले तो कारवाँ भी चल पड़ेगा ।
चलके 'रकमिश' देख लो ख़ुद रौशनी जलने लगी है ।।

                      .......राम केश मिश्र

शनिवार, 7 नवंबर 2015

ग़ज़ल।हर शख़्स गुनेहगार है ।

  ग़ज़ल । हर शख़्स गुनेहगार है।

इश्क़ और प्यार से अब उठ गया एतबार है ।
जिसने भी डाला नज़र हर वो शख़्स गुनेहगार है ।।

है सौदागरों की महफ़िल कभी भूलकर न आना ।
हो संगदिल या हमदिल सब एक से गद्दार हैं ।।

कर रहा होगा कहीँ पर साजिशे तेरे प्यार में ।
जो तेरे लिये तन्हाइयों में आज बेक़रार है ।।

वक्त की पैमाइसे है ,वक्त की नुमाइसे सब ।
जब वक्त तेरा न रहा तब दिल तेरा बेकार है ।।

लुट रहा या लूटता है खुद पता जिसको नही ।
रास्ता जो भी रहा हो पर ग़म यहां तैयार है ।

बन मुसाफ़िर फ़िर रहे है रहबरों की चाह में ।
मुफ़लिसी वे क्या करेगे जो खड़े मजधार है ।।

साहिलों पर टिक न पाते ग़म भरे जज़बात वो ।
'रकमिश' इरादे इश्क़ में ख़ुदा ही मददग़ार है ।।

                      .....R.K.MISHRA

ग़ज़ल।हर शख़्स गुनेहगार है ।

  ग़ज़ल । हर शख़्स गुनेहगार है।

इश्क़ और प्यार से अब उठ गया एतबार है ।
जिसने भी डाला नज़र हर वो शख़्स गुनेहगार है ।।

है सौदागरों की महफ़िल कभी भूलकर न आना ।
हो संगदिल या हमदिल सब एक से गद्दार हैं ।।

कर रहा होगा कहीँ पर साजिशे तेरे प्यार में ।
जो तेरे लिये तन्हाइयों में आज बेक़रार है ।।

वक्त की पैमाइसे है ,वक्त की नुमाइसे सब ।
जब वक्त तेरा न रहा तब दिल तेरा बेकार है ।।

लुट रहा या लूटता है खुद पता जिसको नही ।
रास्ता जो भी रहा हो पर ग़म यहां तैयार है ।

बन मुसाफ़िर फ़िर रहे है रहबरों की चाह में ।
मुफ़लिसी वे क्या करेगे जो खड़े मजधार है ।।

साहिलों पर टिक न पाते ग़म भरे जज़बात वो ।
'रकमिश' इरादे इश्क़ में ख़ुदा ही मददग़ार है ।।

                      .....R.K.MISHRA

नशा ए इश्क

ग़ज़ल   नशा ए इश्क अब छोड़ा न जाए ।  जमाने से मगर उलझा न जाए ।   बड़ी मासूम हैं उसकी अदाएं,   कि मुझसे और अब देखा न जाए ।   गरीबों ...