सोमवार, 10 जुलाई 2017

चाल दुनिया दोगली चलने लगी ।

@ ग़ज़ल।चाल दुनिया दोगली चलने लगी @

       जिंदगी मे अड़चने  बढ़ने  लगी ।
       चाल दुनियां दोगली चलने लगी ।

       लाइलाजे प्यार मे  सौदा  हुआ ।
       इत्तिका में  आबरू लुटने  लगी । 

       हाथ लम्बे है  बहुत  कानून  के ।
       ज़ालिमों की गर्दने  बढ़ने  लगी ।। 

       है दबंगों के लिये ख़ुशियां सभी।
       सादगी  से  ज़िंदगी  डरने  लगी । 

       हुक्मरानों के  लिये  सारा  जहां ।
       जी हुजूरों को सज़ा मिलने  लगी ।

       जाहिलो को मुफ़्त ताजो  तख्तियां ।
       क़ाबिलों को धमकियां खलने लगी ।।

       कर रहे हमआम 'रकमिश,गलतियां।।
       जाबितों की  किस्तियाँ फँसने लगी ।।

                           राम केश मिश्र
                      सुल्तानपुर उत्तर प्रदेश

रविवार, 9 जुलाई 2017

मुहब्बत आपकी देखा नही था ।


बहर- हज़ज मुसद्दस महजूफ़
वज़्न-- 1222 /1222 /122
अर्कान-- मुफ़ाईलुन मुफ़ाईलुन फ़ऊलुन
काफिया- ना
काफ़िया के स्वर- आ
रदीफ़ --- नहीं था
क्वाफी- देखा, चाहा, सोचा, पाया, धोक़ा, सोया, 

मुहब्बत आपकी  देखा  नही था ।
सही है जख़्म भी खाया नही था ।।

इरादे   आपके   बेशक़  सही  थे ।
मुझे ही इश्क़ कुछ आया नही था ।।

उनींदी आज भी  आँखे  हमारी ।
यक़ीनन रात भर सोया नही था ।।

शिकायत है नही दिल को किसी से ।
ज़रूरत थी  कोई  धोख़ा  नही  था ।।

मुझे   मालूम   थी  वो    बेवफ़ाई ।
तभी तो आज तक रोका नही था ।।

बढ़ा दी  ख़ंजरों  की  धार  तुमने ।
सलामत बच सकू मौक़ा नही था ।।

शहादत माँगता है इश्क़ 'रकमिश' ।
यही तो आज तक सोचा नही था ।। 

                  @राम केश मिश्र
                सुल्तानपुर उत्तर प्रदेश


सोमवार, 3 जुलाई 2017

किस्सा सुनाते रह गए सबको ।

बहर-हजज़ मुसम्मन सालिम
अरकान -मफ़ाईलुन मफ़ाईलुन मफ़ाईलुन मफ़ाईलुन
रदीफ़ -रह गए सबको ।
क़ाफ़िया -आते
वज़्न-1222     1222    1222     1222
     ग़ज़ल। किस्सा सुनाते रह गए सबको ।

   कुरेदा जख़्म महफ़िल मे दिखाते रह गए सबको ।
   जफ़ा ऐ इश्क़ का किस्सा सुनाते रह गए सबको ।।

   सकूनत की दवा ख़ातिर महज़ इक आह काफ़ी थी ।
   कोई ढाढ़स नही  देता  बुलाते  रह  गए  सबको ।।

   मिला न एक भी बन्दा मिरा दिल थाम लेने को ।
   उम्रभर आशिकी मे हम मिलाते रह गए सबको ।।

   मुझे ही क्यों मील  लम्हे  भरे  गम  बेहयाई  से ।
   वफ़ा की राह फ़ुर्सत से दिखाते रह गए सबको ।।

   मिली हर बार मुझको ही न जाने बेवफ़ाई  क्यो ।
   दिलों की क़ीमती दौलत लुटाते रह गए सबको ।।

   बड़ी मुद्दत से मिलती है जहाँ में प्यार में ख़ुशियां ।
   बताते रह गए सबको ,  मनाते  रह गए  सबको ।।

   छुपाकर आंख मे आँसू भले रोया था मैं रकमिश ।
   ग़मो के ज़लज़लों मे भी हँसाते रह गए सबको ।। 

                          राम केश मिश्र 

मै तो शायद बदल गया हूं ।

                              गीतिका

मै तो शायद बदल गया हूं
पर तुझमे जज़्बात नही है ।।

और आंधियां ग़म की सहता
इस दिल के हालात नही है ।।

यादों मे तन्हाई ना हो ।
ऐसी कोई रात नही है ।।

अश्को से भीगा रहता हूं
सावन की बरसात नही है ।। 

और दुखो को सह पाऊँ मै ।
अब मेरी औकात नही है ।।  

                              राम केश मिश्र

प्यार की दुनिया बसा ।

         *ग़ज़ल।विश्व मे प्यार की दुनिया बसा ।*

          विश्व मे अब प्यार की  दुनियां  बसा ।
          आज चल तू नेह  का  दीपक  जला ।।

          क्रोध ईर्ष्या लोभ निज अभिमान को ।
          दुर्व्यसन की  भावना  जड़  से  मिटा ।।

          हो  सके तो  बाट  ले  दुख  गैर  का ।
          भूल कर भी दिल किसी का ना दुखा ।।

          जो   मिले  दिव्यांग  सहते   रुग्णता ।।
          मांग  ले  उनके  लिये  रब  से  दुआ ।।

          छोड़   आशा  को  बने जो  आलसी ।
          हौसलों   की  रोशनी  उनको  दिखा ।।

          भावना  पनपा  सदा  ही  शांति  की ।
          विश्व  का  कर  बाद  तेरा  हो  भला ।।

          'राम'  तेरा  जन्म  हो  जाये  सफल ।
          नाम से जादा किसी को क्या मिला ।। 

                           राम केश मिश्र 
                      सुल्तानपुर उत्तर प्रदेश

मंगलवार, 27 जून 2017

इश्क कोई ख़ैरात नही है ।

                              गीतिका
मै तो शायद बदल गया हूं
पर तुझमे जज़्बात नही है ।।

और आंधियां ग़म की सहता
इस दिल के हालात नही है ।।

यादों मे तन्हाई ना हो ।
ऐसी कोई रात नही है ।।

अश्को से भीगा रहता हूं
सावन की बरसात नही है ।। 

और दुखो को सह पाऊँ मै ।
अब मेरी औकात नही है ।।  

                              राम केश मिश्र

हाल कैसे कहे अनकही दोस्ती ।

ग़ज़ल

          हाल कैसे कहे अनकही दोस्ती ।
          उम्रभर हाशिये पर रही दोस्ती ।।

          सब्र हमने जफ़ाएँ किया है बहुत ।
          दर्द उनको मिला तो ढही दोस्ती ।।

          वरना झूठे रहे मेरी यादों के पल ।
          मैं न बोलू तो समझो सही दोस्ती ।।

          फ़ायदों के लिये क़ायदा छोड़ दे ।
          है जफ़ा वो यक़ीनन नही दोस्ती ।।  

          इल्म हो हाल दिल का छुपा न रहे ।
          या ख़ुदा की क़सम है वही दोस्ती ।। 

     
                              राम केश मिश्र।

वक्त मिलता नही आदमी को कभी ।

ग़ज़ल
मुतदारिक मुसम्मन सालिम
रुक्न-गालगा
गालगा गालगा गालगा गालगा ।
अरकान-फ़ायलुन  फ़ायलुन फ़ायलुन फ़ायलुन

212         212     212   212 
ढूढ़ता  कौन  है  जिंदगी  को  कभी ।।
वक़्त मिलता नही आदमी को कभी ।। 

ज़ख़्म गैरो के नासूर करता रहा ।
चाह इसको नही सादगी को कभी ।।

शौक़ का दे हवाला किया पाप है ।
ढूढ़ पाता नही रोशनी को कभी ।।

चल पड़े है अँधेरा मे सुनसान है ।
प्यार देता नही अज़नबी को कभी ।।

लाख़ महफ़िल सजी दिल के सौदे हुए ।
वो न समझा यहाँ दिल्लगी को कभी ।।

रात लेती रही खुब मज़ा चाँद का ।।
रोशनी न मिली चाँदनी को कभी।।

                            राम केश मिश्र

शुक्रवार, 23 जून 2017

आपने आप से टूटता रह गया ।

            ग़ज़ल *आपने आपसे टूटता रह गया ।*

            आपने आप से टूटता रह गया ।।
            उम्रभर जिंदगी ढूढ़ता रह गया ।।

            आदमी जो मिला दोस्ती मे मुझे ।
            दर्द देकर मुझे लूटता रह गया ।।

            बेवफ़ाई से बोझिल कटे रास्ते ।
            मै रुका तो रुका रास्ता रह गया ।।

            जीत मुझको मिली न रहे फांसले ।
            जीतता जीतता हारता रह गया ।। 

            ज़िन्दगी मे सुनामी को मद्देनजर ।
            देखकर मौत से वास्ता रह गया ।। 

            बढ़ गया दोस्तों का हर कारवाँ ।
            मै वफ़ा बेवफ़ा देखता रह गया ।।

            आज हरसूं नज़र आ रही बेबसी ।
            वक़्त गुजरा मुझे रोकता रह गया ।। 

                               @ राम केश मिश्र

गुरुवार, 22 जून 2017

चाहत में किसी के खोने से ।

          *चाहत में किसी की खोने से ।*

चाहत मे किसी के खोने से ।
दिल सोच तु पहले रोने से ।।

एतबार न करना लोगों पर ।
बस प्यार ज़रा सा होने से ।।

हर शक़्स नही तेरे क़ाबिल ।
क़ातिल है रूप सलोने से ।।

बस हार मिलेगी सोच जरा ।
क़िरदार किसी का ढ़ोने से । 

फ़ुर्सत हि नही है लोंगो को ।
अब बीज ग़मो का बोने से ।

क़ीमत लग जायेंगी तेरी ।
दिल तौल रहे है सोने से ।। 

ये अश्क़ नही है मोती है ।
ढरते है आँख के कोने से ।। 

                                 राम केश मिश्र

नशा ए इश्क

ग़ज़ल   नशा ए इश्क अब छोड़ा न जाए ।  जमाने से मगर उलझा न जाए ।   बड़ी मासूम हैं उसकी अदाएं,   कि मुझसे और अब देखा न जाए ।   गरीबों ...