गुरुवार, 9 मार्च 2017

ग़ज़ल।मैं एक दिया था बुझा दिया गया हूं ।

मै एक  दिया था बुझा  दिया  गया हूं ।
उनकी खैरात था लुटा दिया गया हूं।।

हौसला रखता था ए दिल मुहब्बत का।
पर एक मुकाम सा मिटा दिया गया हूं ।।

अब वही लिखता हू तन्हा के आंशुओ से
आपके गम से जो सिखा दिया गया हूं ।।

तब तो मेरे नाम की तारीफ होतीं थी ।
अब बदनाम इशारों से दिखा दिया गया हूं

दर व दर की ठोकरो से आज शाहिलो पर
बेकार आंसुओं सा गिरा दिया गया हूं  ।।

अब चर्चाओं मे मेरा जिक्र नही होता है ।
पुरानी यादो सा मै भुला दिया गया हूं ।।

हशीनाऔ की इक लम्बी दास्तां था मै ।
पर मुहम्बत के खत सा जला दिया गया हूं

मिलता था बेकरारियो मे भरोसा और हौशला ।।
रूस्वाइयो में शराबेगम पिला दिया गया हूं ।।

सकून आ गया जब दर्द बढ़ गया हद से ।
गम के मंजर में डुबो दिया गया हूं ।।

मेरी जिन्दगी इक मुहब्ब्त की मिसाल थी
अब बदनाम और बुझदिल बता दिया गया हूं ।।

               राम केश मिश्र
                भदैयां
                 सुल्तानपुर
                   मो.9125562266
                    

सोमवार, 6 मार्च 2017

ग़ज़ल।मौत को आजमाता जा रहा हूं ।

--------------------------ग़ज़ल-----------------------------

दर्द के क़ाबिल नही पर दर्द पाता जा रहा हूं ।
ऐ ख़ुदा तेरे प्यार में ग़म भुलाता जा रहा हूं ।।

इल्म दुनियां के सितम पर अब मुझे होने लगा ।
दर्द के नग़मे ख़ुसी में गुनगुनाता जा रहा हूं ।।

बंदिशों के बाद भी ये फँस गया कम्बख़्त दिल ।
हमवफ़ाई की सनक में दिल लगाता जा रहा हूं ।।

नासमझ हूं मैं या मेरा है जुनून ऐ इश्क बरपा ।
इश्क़ के हर मोड़ पर ज़ख़्म खाता जा रहा हूं ।।

दोगला इंसा जहाँ में बेवफ़ा खुदगर्ज़ निकला ।
पर वफ़ा में जिंदगी कोरी लुटाता जा रहा हूं ।।

देखकर रिस्तों में सौदा बिक रहा इंसान बेसक ।
लब्ज़ हैं ख़ामोश बस आंशू बहाता जा रहा हूं ।।

या ख़ुदा फैला अँधेरा लूटना लुटना मचा है ।।
देख दुनियां की हक़ीक़त मुस्कुराता जा रहा हूं ।।

हर जुबां ख़ंजर यहाँ रकमिश पुरानी धार है ।।
ज़िन्दगी पँर मौत को आजमाता जा रहा हूं ।

                            ©राम केश मिश्र

बुधवार, 1 मार्च 2017

ग़ज़ल।ऐ ख़ुदा तू पथ्थरे दिल ।


                          @ग़ज़ल@

नेक दिल ख़ून ए आँसू रो नही सकता कभी ।
ऐ ख़ुदा तू पथ्थरे दिल हो नही सकता कभी ।। 

ले रहा होगा मिरा तू इंतिहान- ऐ -सब्र  का ।
दो दिलों में फ़ासला यूँ बो नही सकता कभी ।। 

जिंदगी क़ुर्बान करने के लिये हाज़िर रहा हूं ।
दोस्ती में कर भरोसा खो नही सकता कभी ।।

दर्दे दिल नाज़ुक नही तो मौत क्यों ख़ामोश है ।
उम्रभर तकलीफ़ ऐ दिल ढ़ो नही सकता कभी । 

है सितम ये प्यार का तो मैं भी अब तैयार हूं ।
जान ऐ जां हाथ तुझसे धो नही सकता कभी ।। 

या इलाही तू मिला दे उस मुक़म्मल रूह से ।
चैन की इक नींद रक' सो नही सकता कभी ।। 

                        © राम केश मिश्र



सोमवार, 13 फ़रवरी 2017

ग़ज़ल।मुहब्बत की दवा लेकर।

ग़ज़ल।।लौटा हूं मुहब्बत की दवा लेकर।।

जफ़ा ग़मगीन महफ़िल से आया हूं मज़ा लेकर ।
गवां दी जिंदगी बेशक मुहब्बत की हवा लेकर ।। 

रहा बेफ़िक्र हरपल मै किस्मत के इरादों से ।
बड़ी मुश्किल से ज़िंदा हूं शराफ़त की सज़ा लेकर ।।

नसीबो से मिले ज़ख़्मो को कैसे मैं भुला देता ।
सँजोये फ़िर रहा हूं मैं गुनाहों की अदा लेकर ।।

हुजूमे बावफ़ा देखा खफ़ा नफ़रत के मारे है ।
बहे है आँख से आंशू शरारत की जुबाँ लेकर ।

तुम्हे मालूम न होगा ग़म-ऐ -मंजर तबाही का ।
वफ़ा का क़त्ल करते है इशारों में नफ़ा लेकर ।।

गया मैं हार कर क़ोशिश रफ़ू दिल पर नही होता ।
कुरेदा तो लहू निकले नफ़ासत में रवां लेकर ।।

चले आओ वफ़ाई से मिलन रकमिश" अधूरा है ।
यकीं मानो मैं लौटा हूं मुहब्बत की दवा लेकर ।। 

                               © राम केश मिश्र

                

रविवार, 12 फ़रवरी 2017

ग़ज़ल।बस बेवफ़ाई प्यार में।


      ग़ज़ल।। बस बेवफ़ाई प्यार में ।

मुश्किलों से मिल यहां पाती रिहाई प्यार में ।
दे रहे सब रहगुज़र मसलन दुहाई प्यार में ।।

जो कभी नाकाम थे मंजिले उनको मिली न ।
आज बेशक़ कर रहे है रहनुमाई प्यार में ।।

ह्मवफ़ा सब हो गये इश्क़ के मारे मुवक्किल । 
जल रहे है आज़कल बन रोशनाई प्यार में ।। 

साहिलों पर आज बर्पी हैं निरा ख़ामोशियां ।
कौन देता अब फिरे दर दर गवाही प्यार में । ।

इश्क़ के झांसो मे फँसकर दाँव पर है जिंदगी ।
मौत से बेहतर भली बेशक़ जुदाई प्यार में ।।

हो गया मुझको यकीं इल्म उनको हो न हो ।।
लम्हा लम्हा ग़मसुदा क़ीमत चुकाई प्यार में ।।

मंजिले उनके नसीबों में लिखी थी मिल गयी ।
या ख़ुदा मुझको मिली बस बेवफ़ाई प्यार में ।।

आरजू है ख़ाख रकमिश गर्दिशे थी उम्रभर ।
जख़्म ख़ाकर ज़िन्दगी मैंने लुटाई प्यार में ।।

                         © राम केश मिश्र

गुरुवार, 9 फ़रवरी 2017

ग़ज़ल।मौत भी अपमान की ।

ग़ज़ल।मौत भी अपमान की ।।

खिल्लियां उड़ने लगी है ऐ खुदा ईमान की ।
जीत अब होने लगी है बेवज़ह बेईमान की  ।।

मुजरिमों के लिये है इज्जतें बेशक़ रिहाई ।
बेगुनाहों को सज़ा ये मौत भी अपमान की ।।

प्यार में नाक़ाम निकला ह्मवफ़ा नादान दिल ।
धौंस जमती बेवफ़ा डर इश्क़ में शैतान की ।।

ख़ुद सबूतों की तवज़्ज़ो दे रहे है लोग सब ।
फ़िक्र ऐ क़ीमत नही है वक़्ते दर एहसान की ।।

जान जोख़िम की बदौलत ही बनेंगे ह्मसफर ।
बदगुमानी में लगा कर झूठी बाजी जान की ।।

थम नही पाता यहाँ क्यों दोस्ती का सिलसिला ।
जब क़दर होती नही दिल आरजू सम्मान की ।। 

साहिलों का ज़लज़ला देख तू ख़ामोश कैसे ।
दर्द के नग़मे है रकमिश गर्दिशे-तूफ़ान की ।।

                          ©®® राम केश मिश्र

रविवार, 5 फ़रवरी 2017

ग़ज़ल मुहब्बत जब नजर आती ।


       ग़ज़ल।। मुहब्बत जब नज़र आती ।।

गवाही बेवज़ह निकली जमानत जब नजर आती ।
वफ़ाई की तमन्ना क्यों मुहब्बत जब नज़र आती ।।

गुरु है वो , खुदा , रहबर , ईश्वर है , मसीहा है ।
मिला सबको यहीनन तू जरूरत जब नजर आती ।। 

न मंदिर में न मस्जिद में न गिरजाघर न गुरुद्वारा ।
दिलों में झांककर देखा वो सूरत जब नजर आती ।। 

न माने वो तो मत माने मग़र है मानना उनको ।
झुके वो शर्म के मारे हुकूमत जब नज़र आती ।। 

रहे हो ख़ोज क्या भटका ,खोया वो ज़बाने में ।
ज़र्रे ज़र्रे में  हाज़िर वो मुहूरत जब नज़र आती ।। 

बनो इंसान तू 'रकमिश' वही रब की इबादत है ।
तभी दीदार ए रब होगा ईमानत जब नज़र आती ।।

                                    ©राम केश मिश्र  

रविवार, 29 जनवरी 2017

ग़ज़ल।मुहब्बत जब नज़र आती ।

      ग़ज़ल।। मुहब्बत जब नज़र आती ।।

गवाही की जरूरत क्या जमानत जब नजर आती ।
वफ़ाई की तमन्ना क्यों मुहब्बत जब नज़र आती ।।

गुरु है वो , खुदा , रहबर , ईश्वर है , मसीहा है ।
मिला सबको यहीनन तू जरूरत जब नजर आती ।। 

न मंदिर में न मस्जिद में न गुरुद्वारा न गिरजाघर ।
दिलों में झांककर देखा वो सूरत जब नजर आती ।। 

न माने वो तो मत माने मग़र है मानना उनको ।
झुके वो शर्म के मारे हुकूमत जब नज़र आती ।। 

रहे हो ख़ोज क्या भटका ,खोया वो ज़बाने में ।
ज़र्रे ज़र्रे में  हाज़िर वो मुहूरत जब नज़र आती ।। 

बनो इंसान तू 'रकमिश' वही रब की इबादत है ।
तभी दीदार ए रब होगा ईमानत जब नज़र आती ।।

                                    ©राम केश मिश्र  

सोमवार, 23 जनवरी 2017

ग़ज़ल।ख्वाहिशे तमाम न थी ।

      ग़ज़ल ।। ख्वाहिशें तमाम न थी ।। 

जिंदगी थी रेत सी बन्दिसे तमाम न थी ।
प्यार के आग़ोश में ख्वाहिशे तमाम न थी ।।

कट गये वो दर्द के लम्हे ज़रा सा घाव दे ।
चुप रहा हर जख़्म पर नुमाइशे तमाम न थी ।।

रह गया ख़ामोश मैं वो दग़ा करते रहे ।
प्यार में कायल मेरी फ़रमाइशें तमाम न थी ।।

था बड़ा नादान दिल उनको समझ बैठा ख़ुदा ।
था यकीं मेरे प्यार में आजमाइसे तमाम न थी ।।

रकमिश तुम्हारी याद के आंसू बड़े अनमोल है ।
पर क्या करे दिल गमसुदा रहाईशे तमाम न थी ।।

                                    राम केश मिश्र

सोमवार, 9 जनवरी 2017

ग़ज़ल ।विंदास है कुहरा ।

            ग़ज़ल।विंदास है कुहरा।

आलम ठंडी का आसपास है कुहरा ।
अपनी इस जवानी में विंदास है कुहरा ।।

कुछ समय के लिये आ जाती निशाँ उतरकर ।
कभी हम पसन्द तो कभी विनास है कुहरा ।।

अलावे जलाकर बैठे लड़के जवान लोग ।
बूढ़े भी कहते अब अनायास  है कुहरा ।।

इक किरण आकर रौशन करती ज़मी को ।
देख सूरज की तपिश ख़लास है कुहरा ।।

गर्मी जब बढ़ी कुहरे की परेसान है सूरज ।
देख लोगो की परेसानी उदास है कुहरा ।।

भला सूरज के सामने कहा तक लड़ता वह ।
हुआ बेबस, लाचार, हतास है कुहरा ।।

रात से है दुश्मनी सुबह तक आता नही ।
समय बदला हो गया निरास है कुहरा ।। 

                            © राम केश मिश्र

नशा ए इश्क

ग़ज़ल   नशा ए इश्क अब छोड़ा न जाए ।  जमाने से मगर उलझा न जाए ।   बड़ी मासूम हैं उसकी अदाएं,   कि मुझसे और अब देखा न जाए ।   गरीबों ...