मंगलवार, 4 अक्टूबर 2016

ग़ज़ल।साहिलों पर दुश्मनो को आजमाने पड़ गये।

वक़्त की बंदिश रही वादे निभाने पड़ गये ।
दोस्ती भी न मिली रिस्ते भुलाने पड़ गये ।।

थी जरा मुश्क़िल मग़र मैं फूँक कर चलता रहा । 
बेवज़ह ही हमदिलों के दिल दुखाने पड़ गये ।।

जिंदगी खुद में पहेली सी मुझे लगने लगी थी ।
आँसुओ से ज़ख्म सारे फ़िर नहाने पड़ गये ।।

एक अर्से से सिसकता जी रहा था आज तक ।
दर्द के वो गीत फिर से गुनगुनाने पड़ गये ।।

माँग सकता था नही मै खुद खुदा से मिन्नते पर ।
आपके जज़्बात में खुद को झुकाने पड़  गये ।।

तुम मिले तो क्या मिले जो ख़ुसी थी मिट गयी ।
दर्द बन सैलाब उमड़ा आँसू बहाने पड़ गये ।।

सुन जरा रकमिश तुम्हारी दोस्ती में क्या मिला ।
साहिलों पर दुश्मनों को आजमाने पड़ गये ।।  

                        ©©राम केश मिश्र 'रकमिश'

शनिवार, 10 सितंबर 2016

ग़ज़ल।मैं अकेला कर रहा हूँ ।

  मैं अकेला कर रहा हूँ झूठ का प्रयास कोई ।

मैं अकेला कर रहा हूँ झूठ का प्रयास कोई ।
लोग जो हम उम्र है रच रहे इतिहास कोई ।।

है नही मंज़िल कोई पर चल रहा हूँ रात दिन ।
दर्द बुनता जा रहा हूँ उम्रभर अनायास कोई ।।

रास्ते तक भी नही पर रास्ते है खुद बनाने ।
लापता होकर हँसी का कर रहा एहसास कोई ।

ज़िंदगी का ये सलीक़ा याद तो मुझको रहेगा ।
दूरियाँ मुझको मिली पर आ सका न पास कोई । 

याद मुझको आ रहा है दोस्ती का वो तजुर्बा ।
जिंदगी में प्यार का तो है नही अभ्यास कोई ।।

मंजिलें तुमको मिलेगी फ़िक्र में रकमिश वफ़ा की ।
ख़त्म हो जायेगी ख्वाबो की कोई तालाश कोई ।।

                         ©©राम केश मिश्र

शनिवार, 23 जुलाई 2016

ग़ज़ल।आइना आँख तेरा मुझे बेघर बना देगा ।

ग़ज़ल ।आइना आँख का तेरा मुझे बेघर बना देगा ।

इरादे इश्क़ में बेसक दिले बंजर बना देगा ।
आइना आँख का तेरा मुझे बेघर बना देगा ।।

बहेगा एक दिन तेरे जुदाई में गम-ए-आँसू ।
चुभेगा रात दिन जख़्मी कोई खंजर बना देगा ।।

लक़ीरें हाथ मत देख़ो भरोसा रख खुदाई पर ।
रहा ये प्यार जो सच्चा गमे मंज़र बना देगा ।।

करोगे लाख़ अब कोशिस न आऊँगा दुबारा मैं ।
नकामे इश्क़ इस दिल को कोई लंगर बना देगा ।।

बचूंगा खाक़ मैं मसलन तेरी तन्हाइयां अच्छी ।
जबाना तो तेरी नजरों को ही नश्तर बना देगा ।।

दुआओं से सुना है कि किस्मत भी बदलती है ।
साहिल तू बना रकमिश'समन्दर वो बना देगा ।।  

                           ©© राम केश मिश्र 

बुधवार, 6 जुलाई 2016

ग़ज़ल।शिक़ायत अब नही होती ।

ग़ज़ल।शिक़ायत अब नही होती ।।

वफ़ा के नाम पर बिल्कुल नफ़ासत अब नही होती ।
कोई दिल तोड़ जाये तो शिकायत अब नही होती ।।

मुझे मालुम है पत्थर दिल बनेगा एक दिन पानी ।
मग़र है दर्द का चस्का कि राहत अब नही होती ।।

मिलेगा एक दिन धोख़ा सभी मासूम चेहरों से  ।
छिपी नफ़रत गुमानी है कि चाहत अब नही होती ।।

निगाहों की गुज़ारिश में यहाँ बेदाग़ हर कोई । 
लगाकर तोड़ देते दिल शरारत अब नही होती ।।

सुबह से शाम तक मैंने बहाया था कभी आँसू ।
किसी की चाह में बेसक हिमाक़त अब नही होती ।।

यहाँ आँखों ही आँखों में बसी है रंजिसें हरपल ।
बिक़े या टूट जाये दिल नसीहत अब नही होती ।।

हुआ था ज़ख्म जो रकमिश' वही नासूर बन उभरा ।
करूँ मैं लाख़ क़ोशिश पर मुहब्बत अब नही होती ।

                              © राम केश मिश्र

शुक्रवार, 1 जुलाई 2016

ग़ज़ल।शिक़ायत मुझे जिंदगी से नही।

     ग़ज़ल।शिकायत मुझे जिंदगी से नही ।

मैं मिला हूँ मग़र आदमी से नही ।
शिक़ायत मुझे जिंदगी से  नही ।।

जीत लो सारी दुनिया मुझे गम नही ।
मग़र प्यार से दुश्मनी से नही ।।

एक अर्शे से तलाश जिनकी रही ।
पास आये मग़र तश्नगी से नही ।

तोड़  देते यहाँ लोग दिल साथियो ।
ज़ख्म मिलता मुझे अज़नबी से नही  ।।

दिल के बदले यहाँ सिर्फ दिल चाहिए ।
प्यार मिलता कभी बन्दगी से नही । 

तरसते मिले लोग बेजार है ।
दर्द सहते मगर ताजगी से नही ।।

बात उनसे  हुई तो मचलने लगे ।
पेश आये मग़र सादगी से नही ।। 

अँधेरा ही'रकमिश'सरेआम है ।
नफ़ासत मुझे रोशनी से नही ।।

                   राम केश मिश्र'रकमिश

ग़ज़ल।क्यों ज़मीं से आस्मां मिलता नही ।

ग़ज़ल।क्यों ज़मीं से आस्मां मिलता नही ।

दूरियों का जख़्म अब भरता नही ।
क्यों ज़मीं को आसमां मिलता नही ।।

ढल रही है उम्र बेसक बेखबर ।
चाह का सूरज कभी ढलता नही ।। 

प्यार है ये प्यार की दुश्वारियां ।
प्यार में ईमान तो मरता नही ।।

हो रहा रुसवा तुम्हारे प्यार में ।
ख़्वाब अक़्सर रात में बुनता नही ।। 

प्यार का मरहम खरीदा तुम करो ।
रंजिसों से घाव तो भरता नही ।।

बन रही है आँसुओं की झील इक ।
अश्क़ आँखों में कभी जलता नही ।।

गर्दिसों से दूर साहिल के लिए ।
आदमी खुदगर्ज़ है चलता नही ।। 

एक पौधा तू लगा विश्वास का ।।
बेखुदी में प्यार तो पलता नही ।।

वक्त की है बंदिसे 'रकमिश' मग़र ।
प्यार का उठता धुँआ बुझता नही ।। 

                   राम केश मिश्र'रकमिश'सुल्तानपुरी ।

बुधवार, 29 जून 2016

ग़ज़ल।करे जज़्बात की ख़िदमत वही इंसान होता है।

ग़ज़ल। करे जज़्बात की खिदमत वही इंसान होता है ।।

लगाकर तोड़ देना दिल बड़ा आसान होता है ।
करे जज़्बात की खिदमत वही इंसान होता है ।।

वफ़ा के नाम पर देखा मुझे साहिल मिला तन्हा ।
सच मे रास्ता सच का बड़ा सुनसान होता है ।।

लगाकर जान की बाज़ी यहा खुद भूल जाये जो ।
इमानत की नज़र में तो वही ईमान होता है ।।

बड़ी ही खुशनसीबी से कोई दिल को लुटाता है
बना रिस्ता खुदा का ही कोई फरमान होता है ।।

यहाँ कमसिन कमीनों के हुजूमो के ही जलवे है ।
ज़रा सी हमवफ़ाई पर बड़ा अभिमान होता है ।।

यहाँ हमआम से 'रकमिश' करेगा बेवफ़ाई जो ।
रहे वह उम्र भर ज़िंदा मग़र बेज़ान होता है ।।

             राम केश मिश्र'रकमिश'
        gajalsahil.blogspot.com

शनिवार, 18 जून 2016

ग़ज़ल।यहाँ सब दिल के सौदागर।

         ग़ज़ल।यहा सब दिल के सौदागर।

हुआ बदनाम है साहिल हिफ़ाजत कौन करता है ।
यहाँ सब दिल के सौदागर मुहब्बत कौन करता है ।।

लुटेरे रहनुमां निकले  वफ़ाई की नही हसरत ।
यहाँ झूठी हुक़ूमत की बग़ावत कौन करता है ।

लगे है बागवाँ करने रकीबों की ही पैमाइस ।
सजा बेज़ार है गुलशन हिमाक़त कौन करता है ।

तवज्जो मिल रही काफ़ी यहाँ बेशक़ गुनाहों को
निहायत बेगुनाहों की वक़ालत कौन करता है ।।

अदाओं में निगाहों में मिलेंगे प्यार के झांसे ।
यक़ीनन तोड़ जाते दिल शरारत कौन करता है ।।

सभी धोख़े की दुनिया है ज़रूरत कर रहे पूरी ।
मिला मौक़ा तो तन्हाई मुरौव्वत कौन करता है ।।

भरो न दर्द तुम'रकमिश'किसी मासूम चेहरे पर ।
ग़मो में डूबने की अब ज़रूरत कौन करता ह ।।

                          राम केश मिश्र'रकमिश'

शुक्रवार, 17 जून 2016

ग़ज़ल।ईशारों से समझ लेंगे।

           ग़ज़ल।इशारो से समझ लेंगे ।

झुकी नजरों की बेचैनी निखारों से समझ लेंगे ।
तेरे ख़ामोश अधरों को इशारों से समझ लेंगें ।।

ये मत समझो कि नाज़ुक़ मैं बेगाना हूँ दीवाना हूँ ।
दिले हालात ग़म रौनक़ बहारों से समझ लेंगें ।। 

क़ातिल है तुम्हारे भी शहर मे कुछ तेरे हमदम ।
मिलोगे जब कभी उनसे सहारों से समझ लेंगें ।।

यक़ीनन इश्क़ में बिखरे यहा जज़्बात हैं काफ़ी ।
बहे जो आँख में आंसू किनारों से समझ लेगें ।।

छुपाओ लाख़ तुम रंजिश करोगे क्या बहाना तुम ।
उठी नफ़रत की बेशक़ इन दीवारों से समझ लेगें ।

रहो ख़ामोश'रकमिश'तुम जुबां खोलो या न खोलो ।
तुम्हे कितनी मुहब्बत है विचारों से समझ लेंगें ।।

                    राम केश मिश्र'रकमिश, 

गुरुवार, 16 जून 2016

ग़ज़ल।मुँह छिपाना मेरी आदत तो नही।

    ग़ज़ल।मुँह छिपाना मेरी आदत तो नही ।

बेजुबां बन सर कटाना है शहादत तो नही ।
ज़ालिमों सा मुँह छिपाना मेरी आदत तो नही ।

लाख़ हो बंदिश सज़ा ऐ मौत खुद हो सामने ।
बढ़ चलेगे शान से कुछ खूबसूरत तो नही ।।

चुपके चुपके चल रही है देश में कुछ साजिशें । 
काले धन पर ही नजर है ये हक़ीक़त तो नही ।?

बिक रहा है दौलतों से अब यहा ईमान देखो ।
घूस लेकर मुस्कुराना भी शराफ़त तो नही ।।

है छुपे गद्दार अपने देश में इनको निकालो ।
चुपके चुपके कर रहे होंगें हुकूमत तो नही ।?

साफ़ सुथरी नीति में आज भी धोख़ा छिपा है।
है बहुत अड़चन बदलने की जरूरत तो नही ।?

जाने दो'रकमिश'यहा के लोग है क़ायल बहुत ।
हो गयी है चलबाजों से मुहब्बत तो नही ।? ।

                  राम केश मिश्र'रकमिश'

नशा ए इश्क

ग़ज़ल   नशा ए इश्क अब छोड़ा न जाए ।  जमाने से मगर उलझा न जाए ।   बड़ी मासूम हैं उसकी अदाएं,   कि मुझसे और अब देखा न जाए ।   गरीबों ...